त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)
Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary
महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा
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दशमोऽध्यायः । १४३
एवं तत्र पुरा हेमलेखया खलु बोधितः ॥ ६७ ॥
हेमचूड़ोऽभवद्विद्वान्जीवन्मुक्तस्तथेतेरे ।
स्त्रीबालप्रमुखाः सर्वे जाता ज्ञातपरावराः ॥ ६८ ॥
तस्माच्छ्रेयोनिदानं तु सत्सङ्गः प्रथमं भवेत् ।
तस्माच्छ्रेयोवाञ्छने तु सत्संश्रयपरो भवेत् ॥ ६९ ॥
इति श्रीमज्ज्ञानखण्डे हेमचूड़ोपाख्याने दशमोऽध्यायः ।
इस प्रकार पूर्वकालमें वहाँ हेमलेखाके द्वारा ज्ञान प्राप्त करनेवाला
हेमचूड नामका तत्त्ववेत्ता और जीवन्मुक्त राजा हुआ। उसके पश्चात्
स्त्री और बालक पर्यन्त अन्य सब लोग भी परमतत्त्वको जान
गये ॥ ६७ उ०-६८ ॥
इसलिये कल्याणका सबसे पहला साधन सत्संग है। इसलिये जिसे
निःश्रेयसकी इच्छा हो उसे सन्तोंके सहवासमें रहना चाहिये ॥ ६६ ॥
दशम अध्याय समाप्त ।