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सर्वकोश
त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary

महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा

DevanagariHindipublished404 पृष्ठ

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पृष्ठ 149

दशमोऽध्यायः । १३५
अकृत्वा वापि कृत्वा वा न तल्लभ्येत कर्हिचित् ।
अगत्वा चापि वा गत्वा न तदासादयेत्पदम् ॥ १८ ॥
निमील्य कृत्वा गत्वा वा प्राप्तं पूर्णं कथं भवेत् ।
यवाष्टकमितेनैव पक्ष्मणोन्मीलितेन तु ॥ १९ ॥
अन्तर्हितं यदि तदा ननु पूर्णं भवेत्पदम् ।
अहो ते मोहमाहात्म्यमाश्चर्यं किमहं ब्रुवे ॥ २० ॥
यस्मिन्ब्रह्माण्डकोटीनां कोटयः कोणसंस्थिताः ।
पक्ष्मणोऽङ्गुलिमानस्योन्मीलनात्तत्तिरोहितम् ॥ २१ ॥
शृणु राजकुमारैतत्तत्त्वसारं वदामि यत् ।
यावद् ग्रन्थिविभेदो न न तावत्सुखमृच्छति ॥ २२ ॥
ग्रन्थयः कोटिशः सन्ति मोहरज्जुविवर्त्तिताः ।
तत्र स्वरूपासंविन्निर्मोहरज्जुरुदीरिता ॥ २३ ॥
यत्र ता ग्रन्थयः सन्ति विपरीतग्रहात्मकाः ।
तत्राद्या देहमुख्येषु भवेदात्मत्वनिश्चयः ॥ २४ ॥
इसी प्रकार कुछ करने या न करनेसे भी वह कभी नहीं मिलता
तथा कहीं जाने या न जानेसे भी उस पदकी प्राप्ति नहीं होती ॥ १८ ॥
जो वस्तु आँख मूँदने, करने या जानेसे मिलती है वह भला,
पूर्ण कैसे हो सकती है ? यदि आठ जौके बराबर आकारवाले पलकोंके
खोलनेसे ही वह पद लुप्त हो जाता है तो वह अच्छा पूर्ण पद हुआ ?
अहो ! आपके मोहकी बड़ी विलक्षण महिमा है । इस आश्चर्यके विषयमें
मैं क्या कहूँ ॥ १९-२० ॥
जिसके एक कोनेमें करोड़ों ब्रह्माण्ड पड़े हुए हैं वह परमपद एक
अंगुलि बराबर पलकके खोलनेसे ही लुप्त हो जाता है ! ॥ २१ ॥
राजकुमार ! सुनिये, मैं जो तत्त्वका सार है वह आपको बताती
हूँ, क्योंकि जबतक ग्रन्थि ( गाँठ ) नहीं खुलती तबतक आनन्द प्राप्त
नहीं होता ॥ २२ ॥
इस अज्ञानरूप रज्जुमें करोड़ों ग्रन्थियाँ भासित हो रही हैं, और
आत्मस्वरूपको न पहचानना यही अज्ञान-रज्जु कही गयी है ॥ २३ ॥
उसमें जो विपरीतग्रहणरूप ग्रन्थियाँ हैं उनमें सबसे पहली है
देहादिमें आत्मबुद्धि करना ॥ २४ ॥