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सर्वकोश
त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary

महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा

DevanagariHindipublished404 पृष्ठ

पृष्ठ 148, कुल 404 में से

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पृष्ठ 148

१३४ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे
सुखार्थिनो दुःखसंघं सञ्चिन्वन्ति मुधा सदा ।
तदलं दुःखभोगेन स्वयत्नासादितेन वै ॥ १२ ॥
प्रिये कृपां मयि कुरु प्रार्थयामि कृताञ्जलिः ।
विश्रान्तिमभिवाञ्छामि चिरं स्वस्मिन्सुखात्मनि ॥ १३ ॥
अहो दैवहता भासि ज्ञात्वापि त्वमिदं पदम् ।
तद्विश्रान्तिं परित्यज्य मुधा दुःखाय चेष्टसे ॥ १४ ॥
इत्युक्ता सा प्रियं प्राह स्मयित्वेपन्मनीषिणी ।
नाथ ते तन्न विदितं पदं परमपावनम् ॥ १५ ॥
यत्र स्थिता न मुह्यन्ति पण्डिताः पावनाशयाः ।
तत्पदं दूरतस्तेस्ति भूस्थस्येव नभस्तलम् ॥ १६ ॥
त्वया किञ्चित्सुविदितं भवेदविदितोपमम् ।
निमील्योन्मील्य वा नेत्रे तत्पदं न समीक्ष्यते ॥ १७ ॥
सुखकी लालसा रहनेपर भी, व्यर्थ ही सर्वदा दुःखराशिका ही संग्रह करते
रहते हैं। अतः अपने ही प्रयत्नसे प्राप्त किये हुए दुःखभोगकी अब मुझे
आवश्यकता नहीं है ॥ ११ उ०-१२ ॥
प्रिये ! मैं हाथ जोड़कर प्रार्थना करता हूँ, तुम मुझपर कृपा करो।
अब तो मैं अपने इस आनन्दस्वरूप आत्मामें ही चिरकालतक विश्रान्त
रहना चाहता हूँ ॥ १३ ॥
अहो ! मुझे तुम बड़ी अभागिनी जान पड़ती हो, जो इस पदको
जानकर भी तुम इसकी विश्रान्तिको छोड़कर व्यर्थ ही दुःख भोगनेके
लिये व्यवहारमें लगी रहती हो” ॥ १४ ॥
इस प्रकार कहे जानेपर वह विवेकवती बाला कुछ मुसकराकर
अपने प्रियतमसे बोली, “नाथ ! अभी आपको उस परम पवित्र पदका
पता नहीं लगा है ॥ १५ ॥
पवित्र हृदय पण्डितजन जिसमें स्थित होकर कभी मोहग्रस्त नहीं
होते वह पद तो अभी आपके लिये वैसे ही दूर है जैसे पृथ्वीपरके
मनुष्यके लिये आकाश ॥ १६ ॥
आपने जो कुछ ठीक-ठीक समझा है वह तो न समझनेके समान
ही है। वह पद आँखोंको मूँदने या खोलनेसे नहीं देखा जाता ॥ १७ ॥