त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)
Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary
महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा
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यद्वशादेष संसार आततो दुष्प्रतिक्रियः ।
तथा जगत्यनात्मत्वबुद्धिर्भानसमाश्रये ॥ २५ ॥
एवं जीवेशभेदादिनिश्चया ग्रन्थयो मताः ।
एतच्चिरात्समुद्भूतं भूयः संवर्धितं च वै ॥ २६ ॥
ग्रन्थिरूपसमापन्नं पुरुषः पाशितस्ततः ।
तद्ग्रन्थिविस्रंसनतो बन्धान्मुक्तिः समीरिता ॥ २७ ॥
यत्त्वं निमील्य नेत्रे स्वे पदमासादयस्यलम् ।
तत्पदं निजरूपं ते शुद्धसंविदनुत्तरम् ॥ २८ ॥
तदेवाखिलसंसारचित्रादर्शतलं महत् ।
कदा क्व केन रूपेण नास्ति तन्मे निरूपय ॥ २९ ॥
यदा यद्रूपतो यस्मिन्नेति ब्रूयाः स्वसंविदम् ।
तर्हि तत्कालदेशादेर्वन्ध्यापुत्रत्वमेव हि ॥ ३० ॥
जिसके कारण इस संसारका विस्तार हुआ है, जिससे छुटकारा
पाना बड़ा ही कठिन है। तथा [ दर्पणमें प्रतिबिम्बके समान ] केवल
भानके आश्रय खड़े हुए इस संसारमें अनात्मबुद्धि होना [ दूसरी ग्रन्थि
है ] ॥ २५ ॥
इसी प्रकार जीव और ईश्वरमें भेद-निश्चय करना आदि अन्य
ग्रन्थियाँ मानी गयी हैं। यह स्वरूपका अज्ञान अनादिकालसे उत्पन्न
और बार-बार उलझकर ग्रन्थिरूप हो गया है। उसीसे यह पुरुष
बँधा हुआ है। उस ग्रन्थिके कट जानेसे ही जीवकी बन्धनसे मुक्ति
कही जाती है ॥ २६-२७ ॥
अपने नेत्रोंको मूँदकर आपने जो पूर्णपद प्राप्त किया है वह तो
आपका अपना ही स्वरूप है और वह सम्पूर्ण अनात्मवर्गका निषेध
करनेपर बचनेवाली शुद्ध संवित् ही है ॥ २८ ॥
वही इस सम्पूर्ण संसार-चित्रको प्रतिबिम्बित करनेवाला महान् दर्पण
है। मुझे बताइये तो, वह कब, कहाँ और किस रूपमें नहीं है? ॥ २९ ॥
आप जिस काल, जिस रूप और जिस देशमें उस आत्मसंवित्का
अभाव बतलायेंगे तब वे देश और कालादि तो वन्ध्यापुत्रके समान अलीक
सिद्ध होंगे ॥ ३० ॥