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सर्वकोश
त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary

महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा

DevanagariHindipublished404 पृष्ठ

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पृष्ठ 129

नवमोऽध्यायः । ११५
के वा वयं स्वरूपं किमस्माकं तद् ब्रवीहि मे ।
इति पृष्टा हेमलेखा रामोवाच प्रियं प्रति ॥ ५ ॥
नाथ शृणु प्रवक्ष्यामि गूढार्थमिदमादरात् ।
विचारयात्मनो रूपं बुद्ध्याऽत्यन्तविशुद्धया ॥ ६ ॥
न दृश्यं नापि तद्द्वाच्यमतो वक्ष्यामि तत् कथम् ।
ज्ञातस्वात्मस्वरूपो वै ततो ज्ञास्यसि मातरम् ॥ ७ ॥
न ह्यादेशस्वरूपेऽस्ति तत आदेष्टृवर्जितम् ।
स्वं रूपं स्वात्मना पश्य शुद्धबुद्धिसमाश्रयम् ॥ ८ ॥
देवादितिर्यगन्तानां भान्तं भानैरभासितम् ।
भान्तं सर्वत्र सर्वस्य सर्वदा भानवर्जितम् ॥ ९ ॥
हम कौन हैं और हमारा स्वरूप क्या है—यह भी मुझसे कहो ।”
परशुराम ! इस प्रकार पूछे जानेपर हेमलेखानें अपने प्रियतमसे
कहा ॥ ५ ॥
“नाथ ! सुनिये, मैं यह गूढ रहस्य सुनाती हूं। आप आदर-
पूर्वक विशुद्ध बुद्धिसे अपने स्वरूपका विचार करें ॥ ६ ॥
वह आत्मतत्त्व न तो देखनेमें आता है और न कहा ही जा सकता
है। अतः मैं किस प्रकार उसका वर्णन करूँ। आपको जब उस
आत्माके स्वरूपका ज्ञान हो जायगा तभी आप अपनी माताको भी
जान सकेंगे ॥ ७ ॥
आत्माके स्वरूपके विषयमें कोई उपदेश भी नहीं हो सकता,
इसलिये उसका कोई उपदेश करनेवाला भी नहीं है। आप शुद्ध
बुद्धिके आश्रयभूत उस आत्मस्वरूपको आत्मभावसे ही देख सकते
हैं* ॥ ८ ॥
वह देवताओंसे लेकर कीट-पतंगादि पर्यन्त सभीके आत्मस्वरूपसे
भासमान है, किन्तु किसी भी अन्य प्रकाशसे प्रकाशित होनेवाला
नहीं है। वही सबको सर्वत्र ज्ञानरूपसे भास रहा है, किन्तु किसी भी
प्रमाण का विषय नहीं है ॥ ९ ॥

  • 'शुद्धबुद्धि' अर्थात् विषयविमुक्त बुद्धिके 'आश्रय'-अधिष्ठान भूत उस आत्म-
    तत्त्वको निखिल दृश्यरूप अनात्माका निषेध कर देनेपर 'आत्मभाव'से अर्थात दृश्य
    और दृश्याभावके साक्षीरूपसे ही अनुभव कर सकते हैं।