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सर्वकोश
त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary

महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा

DevanagariHindipublished404 पृष्ठ

पृष्ठ 128, कुल 404 में से

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पृष्ठ 128

नवमोऽध्यायः
श्रुत्वेत्थं प्रियया प्रोक्तं हेमचूड़ोऽतिविस्मितः ।
हर्षगद्गदया वाचा पुनर्वक्तुं प्रचक्रमे ॥ १ ॥
धन्या प्रियेऽसि निपुणा अहो ते ज्ञानवैभवम् ।
किं वर्णयामि यत् प्रोक्तमाख्यारूपतयाऽखिलम् ॥ २ ॥
एवंविधं स्ववृत्तं मे नाभवद्विदितं क्वचित् ।
त्वदुक्त्याऽहं सम्प्रति तत् करामलकवत् स्फुटम् ॥ ३ ॥
स्मराम्यनुभवाम्यन्तरहो लोकक्रियाऽद्भुता ।
का सा परा चितिर्माता कथं तस्यास्तु नो जनिः ॥ ४ ॥
नवम अध्याय ॥ ९ ॥
हेमलताके उपदेशसे हेमचूडको आत्मतत्त्वकी उपलब्धि
अपनी प्रियाके द्वारा ऐसा तत्त्वविवेचन सुनकर हेमचूडको बड़ा
आश्चर्य हुआ और उसने हर्षगद्गद् वाणीसे पुनः कहना आरम्भ
किया ॥ १ ॥
“प्रिये ! तुम धन्य हो, बड़ी ही चतुर हो तथा तुम्हारी ज्ञानसम्पत्ति
भी धन्य है। तुमने आख्यायिकाके रूपमें जो कुछ कहा है उसका मैं
क्या वर्णन करूँ ? ॥ २ ॥
मुझे इस प्रकारका अपना ही वृत्तान्त पहले कभी विदित नहीं
हुआ। अब तुम्हारे कथनसे यह स्थिति हथेलीपर रखे हुए आँवलेके
समान स्पष्ट हो गयी है ॥ ३ ॥
अब तो मुझे अपने भीतर ही उस स्थितिका स्मरण और अनुभव
हो रहा है। अहो ! यह लोकव्यवहार बड़ा ही विचित्र है। [ पर यह
तो बताओ कि ] वह हमारी माता पराचिति क्या है और उससे हमारा
जन्म कैसे होता है ? ॥ ४ ॥