त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)
Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary
महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा
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कथं कुत्र कदा केन निरूप्येतापि लेशतः ।
मन्नेत्रं दर्शयत्येवमुक्तमेतत् प्रियाधुना ॥ १० ॥
नात्राचार्यस्योपयोगो यथा नयनदर्शने ।
निपुणोऽपि महाचार्यः कथं नेत्रं प्रदर्शयेत् ॥ ११ ॥
अतो गुरुपायोऽत्र तदुपायप्रदर्शनात् ।
तत्ते वक्ष्याम्युपायन्तच्छृणु संयतमानसः ॥ १२ ॥
यावत्त्वमात्मनि ममेत्येवन्तु प्रतिपश्यसि ।
ततः परं निजं रूपं यन्ममेति न भाति ते ॥ १३ ॥
गत्वैकान्ते विविच्यैतद्यद्यद्भाति ममत्वतः ।
तत्तत् परित्यज्य परं स्वात्मानमभिलक्षय ॥ १४ ॥
यथाऽहं ते ममत्वेन भासनान्नात्मता मयि ।
सम्बन्धमात्रादात्मीया न स्वरूपगता ह्यहम् ॥ १५ ॥
उसका किसीके द्वारा किसी भी देश या कालमें किस प्रकार
लेशमात्र भी निरूपण किया जा सकता है। प्रियतम ! यह बात ऐसी
ही है जैसे कोई कहे कि अब मुझे मेरे नेत्र दिखाओ ॥ १० ॥
जिस प्रकार नेत्रोंको दिखानेमें आचार्यका कोई उपयोग नहीं हो
सकता, क्योंकि कोई अत्यन्त कुशल आचार्य भी भला नेत्रोंको कैसे
दिखा सकता है ॥ ११ ॥
अतः गुरुदेव तो आत्मदर्शनका उपाय दिखानेके कारण ही इसमें
उपयोगी हैं। इसलिये मैं उसका उपाय बताती हूं, आप एकाग्रचित्त
होकर सुनें ॥ १२ ॥
आप अपनेमें जहाँतक 'मेरा' ऐसा अनुभव करते हैं, आपका
अपना स्वरूप उससे भिन्न ही है, जो आपको 'मेरा' इस रूपसे नहीं
भासता ॥ १३ ॥
अब आप एकान्तमें जाकर इसका विवेचन करें और आपको
जो कुछ 'मेरा' इस रूपमें प्रतीत हो उसे त्यागकर अपने आत्माको
पहिचानें ॥ १४ ॥
जिस प्रकार मैं आपको अपनी रूपसे भासती हूं, इसलिये मुझमें
आपका आत्मभाव नहीं हो सकता। केवल सम्बन्ध होनेके कारण
आत्मीय तो हूं किन्तु आपके स्वरूपके अन्तर्गत नहीं हूँ ॥ १५ ॥