त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)
Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary
महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअष्टमोऽध्यायः ११३
क्रोधो लोभश्च तावुक्तौ तत्पुरन्तु शरीरकम् ।
मम यस्तु महामन्त्रः स्वरूपस्फुरणं हि तत् ॥ ३१ ॥
प्राणप्रचारः सम्प्रोक्तो मनसस्तु प्रियः सखा ।
कान्ताराद्यास्तु नरका एवं सर्वं प्रकीर्त्तितम् ॥ ३२ ॥
मया बुद्धेः सङ्गमस्तु समाधिरभिधीयते ।
मन्मातृलोकसंप्राप्तिर्मोक्षः प्रिय उदाहृतः ॥ ३३ ॥
एवं प्रोक्तः स्ववृत्तान्तस्त्वमप्येवंविधौ ननु ।
तद्युक्त्यैतत् सुविज्ञाय परं श्रेयः समाप्नुहि ॥ ३४ ॥
इति श्रीमज्ज्ञानखण्डे हेमचूडोपाख्याने संसारा-
ख्यायिकाविवरणे अष्टमोऽध्यायः ।
दो पुत्र हैं वे क्रोध और लोभ कहे गये हैं। उनका नगर है शरीर।
मेरा जो महामन्त्र है वह है स्वरूपका स्फुरण ॥ ३०-३१ ॥
प्राणको ही मनका प्रिय सखा प्रचार कहा गया है और वन आदि
हैं नरक। इस प्रकार यह सारे प्रसंगका निरूपण हो गया ॥ ३२ ॥
बुद्धिका मेरे साथ समागम होना—यह समाधि कही गयी है और
हे प्रिय ! मेरी माता के लोककी प्राप्ति-यह मुक्ति है ॥ ३३ ॥
इस प्रकार मैंने अपना वृत्तान्त कहा। आप भी निश्चय इसी प्रकार
हैं। अतः युक्तिपूर्वक इसका रहस्य समझकर परम श्रेयको प्राप्त
कर लीजिये ॥ ३४ ॥
अष्टम अध्याय समाप्त।