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सर्वकोश
त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary

महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा

DevanagariHindipublished404 पृष्ठ

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पृष्ठ 116

१०२ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे
कुण्ठिता सापि भवति परमेशपरायणे ।
अकुण्ठितापि भवति यतः सा तादृशी भवेत् ॥ ६६ ॥
तस्मात् कुतर्कं सन्त्यज्य महेशं शरणीकुरु ।
अहेतुकतया स त्वां नियोजयति श्रेयसि ॥ ६७ ॥
एतावदेव सोपानं प्रथमं क्षेमसौधकम् ।
एतद्विहाय चान्यत्र नास्तीपत्फलसम्भवः ॥ ६८ ॥
श्रुत्वेत्थं वचनं राम हेमचूडः प्रियोदितम् ।
पप्रच्छ भूयस्तां कान्तामतिहृष्टमनास्तदा ॥ ६९ ॥
प्रिये महेश्वरं ब्रूहि यः शरण्यो भवेन्मम ।
सर्वकर्ता स्वतन्त्रात्मा यच्छक्त्या नियतं जगत् ॥ ७० ॥
तं विष्णुमाहुः केचिद्वै केचिच् शिवगणेश्वरम् ।
तथा सूर्यं नृसिंहादीन् बुद्धं सुगतमेव च ॥ ७१ ॥
किन्तु भगवत्परायण पुरुषोंके लिये वह कुण्ठित हो जाती है ।
तथापि वह है अकुण्ठिता ही, क्योंकि वह है ऐसी ही [ अर्थात् भक्तोंके
लिये कुण्ठित हो जाना उसका स्वभाव ही है, इसलिये इससे उसकी
अकुण्ठिततामें कोई अन्तर नहीं आता ] ॥ ६६ ॥
“इसलिये आप कुतर्क छोड़कर निष्काम भावसे भगवान् महेश्वरकी
शरण लीजिये । वे आपको परम निःश्रेयसकी प्राप्ति करा देंगे” ॥ ६७॥
“निःश्रेयसकी अट्टालिका पर चढ़नेके लिये यही पहली सीढ़ी है ।
इसे छोड़कर किसी अन्य साधनसे थोड़ा-सा भी फल प्राप्त नहीं हो
सकता” ॥ ६८ ॥
परशुराम ! अपनी प्रियाके कहे हुए ये वचन सुनकर हेमचूडने
अत्यन्त प्रसन्नचित्त हो फिर उससे पूछा ॥ ६९ ॥
“प्रिये ! मेरे शरण्य जो महेश्वर हैं उनके स्वरूपका वर्णन करो; जो
सब कुछ करनेवाले और परमस्वतन्त्र हैं तथा जिनकी शक्तिसे संसारका
नियमन होता है ॥ ७० ॥
उन्हें कोई विष्णु कहते हैं, कोई शिव या गणपति बतलाते हैं