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सर्वकोश
त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary

महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा

DevanagariHindipublished404 पृष्ठ

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पृष्ठ 117

सप्तमोऽध्यायः । १०३
अर्हन्तं वासुदेवञ्च प्राणं सोमञ्च पावकम् ।
कर्म प्रधानमणव इत्यादि बहुधा जगुः ॥ ७२ ॥
जगत्कारणरूपं वै विचित्रमतभेदितम् ।
तत्र क्वेश्वरबुद्धिस्तु कर्त्तव्या तत् समीरय ॥ ७३ ॥
न ते ह्यविदितं किञ्चिद् भवेदिति हि निश्चयः ।
यतः स भगवान् व्याघ्रपादो दृष्टपरावरः ॥ ७४ ॥
अतस्ते योषितोऽप्येवं ज्ञानमेतद्विराजते ।
ब्रूहि मे श्रद्दधानाय प्रियामृतप्रभाषिणी ॥ ७५ ॥
पृष्टैवं सा हेमलेखा प्रियेण प्राह हर्षिता ।
नाथ ते सम्प्रवक्ष्यामि शृण्वीश्वरविनिर्णयम् ॥ ७६ ॥
ईश्वरो हि जगज्जालप्रलयोत्पादकृद् भवेत् ।
स विष्णुः स शिवो धाता स सूर्य्यः सोम एव च ॥ ७७ ॥
तथा कोई सूर्य, नृसिंह, बुद्ध, सुगत, अर्हत्, वासुदेव, प्राण, सोम,
अग्नि, कर्म, प्रधान या अणु आदि अनेकों प्रकारोंसे उनका प्रतिपादन
करते हैं ॥ ७१-७२ ॥
इस प्रकार जगत्‌के कारणका स्वरूप तरह-तरहके मतभेदोंसे
विभिन्न-सा हो गया है। ऐसी स्थितिमें कहाँ ईश्वरबुद्धि करनी चाहिये-
यह बताओ ॥ ७३ ॥
यह तो मुझे निश्चय है कि कोई बात नहीं है जो तुम्हें मालूम न हो,
क्योंकि भगवान् व्याघ्रपाद परावरदर्शी थे [ उन्हें लोक, परलोक और
परमात्मा सभीका पूर्ण ज्ञान था ] ॥ ७४ ॥
इसीसे स्त्री होनेपर भी तुममें ऐसा ज्ञान है। प्रिये ! तुम अमृतके
समान मधुर और हितकर भाषण करनेवाली हो, मुझ श्रद्धालुसे यह
रहस्य कहो” ॥ ७५ ॥
प्रियतमके इस प्रकार पूछनेपर हेमलेखाने प्रसन्न होकर कहा,
“नाथ ! सुनिये मैं ईश्वरके विषयमें अपना निर्णय सुनाती हूँ ॥ ७६ ॥
इस जगत्‌के ताने-बानेकी जो प्रलय और उत्पत्ति करनेवाला है, वह
ईश्वर है। वही शिव, वही ब्रह्मा, सूर्य और चन्द्रमा भी है ॥ ७७ ॥