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सर्वकोश
त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary

महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा

DevanagariHindipublished404 पृष्ठ

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पृष्ठ 115

सप्तमोऽध्यायः । १०१

प्रारब्धं नियतिर्वापि महेशविमुखं भवेत् ।
एतन्मृकण्डुतनयेऽत्यन्तमीश्वरतत्परे ॥ ६० ॥
सर्वैर्ज्ञातं महेशस्य नियत्यारब्धलङ्घनम् ।
अत्रोपपत्तिन्ते वक्ष्ये शृणु प्राणप्रियेरितम् ॥ ६१ ॥
यद्यप्यनुल्लङ्घनीये प्रारब्धनियती खलु ।
तथाप्यपौरुषाणां तत् प्रारब्धमनपोहनम् ॥ ६२ ॥
अतएव प्राणायामैः प्रारब्धं परिजीयते ।
न तान् दृष्टेषु दुःखेषु प्रारब्धं योजयत्यलम् ॥ ६३ ॥
प्रारब्धाहिनिगीर्णास्ते ये पौरुषपराङ्मुखाः ।
एतन्नियति-संकॢप्तं तथैवानुभवान्न्नु ॥ ६४ ॥
नियतिः स्यादीशशक्तिः सङ्कल्पैकस्वरूपिणी ।
सत्यसङ्कल्प एवेशोऽनुल्लङ्घ्या ह्यत एव सा ॥ ६५ ॥

प्रारब्ध या नियति तो महेश्वरसे विमुखोंके लिये ही है। अत्यन्त
भगवत्परायण मार्कण्डेय जी के प्रसंगमें भगवान् महेश्वरने नियति और
प्रारब्धका उल्लङ्घन किया—यह बात सभीको मालूम है। प्राणप्रिय !
सुनिये, इस विषयमें मैं आपको उपपत्ति भी बतलाती हूँ ॥ ६०-६१ ॥
यद्यपि प्रारब्ध और नियतिका उल्लङ्घन होना निश्चय ही सम्भव
नहीं है, तथापि यह प्रारब्धकी अतिवृत्ति पुरुषार्थहीनोंके लिये ही
है ॥ ६२ ॥
इसीसे प्राणायामके द्वारा भी प्रारब्धपर विजय प्राप्त हो जाता है।
प्राणायाम-परायण योगियोंको प्रारब्ध दृष्ट-दुःखोंमें बिलकुल नहीं फँसा
सकता ॥ ६३ ॥
जो लोग पुरुषार्थसे विमुख हैं वे ही प्रारब्धरूप सर्पके मुँहमें पड़ते
हैं। यह नियतिका ही संकल्प है और अनुभवसे भी ऐसा ही सिद्ध
होता है ॥ ६४ ॥
नियति परमात्माकी शक्ति है और उसका स्वरूप केवल संकल्प
है। भगवान् सत्यसंकल्प ही हैं, इसीसे नियतिका उल्लङ्घन नहीं हो
सकता ॥ ६५ ॥