त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)
Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary
महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा
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निर्हेतुकोपासनस्य ज्ञात्वा निर्हेतुतां चिरात् ।
मितेश्वरोऽप्यन्यव्यवस्थस्तदधीनो भवेत्यलम् ॥ ५४ ॥
निर्हेतुकत्वज्ञानाय चिरं स्यादज्ञभावतः ।
एष सर्वेश्वरो देवो हृदयेषोऽखिलस्य तु ॥ ५५ ॥
सर्वं जानाति तत्काले फलं दद्याच्च सत्वरम् ।
आर्तमर्थार्थिनं देवस्तदर्येनाभियोजितुम् ॥ ५६ ॥
स्वनियत्या कर्मपाकं प्रतीक्ष्य फलमादिशेत् ।
निर्हेतुकोपासकं स्वमनन्यशरणं विभुः ॥ ५७ ॥
ज्ञात्वा सर्वात्मना तस्य योगक्षेमवहो भवेत् ।
अप्रतीक्ष्यं कर्मपाकं नियतिं स्वां विधूय च ॥ ५८ ॥
तत्साधनं सम्प्रसाध्य द्रुतं संयोजयेत् फले ।
एतदेव महेशत्वं स्वातन्त्र्यमहतन्तु यत् ॥ ५९ ॥
किन्तु जिसकी उपासना निष्काम होती है, कुछ काल बीतनेपर
जब उसकी निष्कामताका पता लगता है तो संसारका सीमित
ऐश्वर्यवाला अन्यवस्थित-चित्त स्वामी भी सर्वथा उसके अधीन हो
जाता है ॥ ५४ ॥
वह अज्ञानी होता है, इसलिये उपासककी निष्कामताको पहचाननेमें
उसे तो बहुत समय लग जाता है। किन्तु भगवान् सर्वेश्वर तो सभीके
हृदयोंके स्वामी हैं ॥ ५५ ॥
वे तो तत्काल सब कुछ जान जाते हैं और तुरन्त ही उसका फल
भी दे डालते हैं। वे आर्त और अर्थार्थीको तो अपनी नियतिके अनुसार
कर्मके परिपाककी प्रतीक्षा करके फल देते हैं ॥ ५६-५७ पू० ॥
किन्तु जिसे अपना अनन्य-शरण निष्काम उपासक देखते हैं उसके
योग-क्षेमका तो सभी प्रकार निर्वाह करते हैं ॥ ५७ उ०-५८ पू० ॥
वे कर्मविपाकको प्रतीक्षा न करके तथा अपनी नियतिकी उपेक्षा
करके उसके साधनकी पूर्ति करके तुरन्त ही उसे फलकी प्राप्ति करा
देते हैं। यही उनकी महेश्वरता और परम स्वतन्त्रता है ॥ ५८ उ०-५६ ॥
१. योग-क्षेमका अर्थ भक्तके निर्वाहका सुभीता नहीं समझना चाहिये, प्रत्युत
'योग' का अर्थ है साधनके अनुकूल परिस्थितिकी प्राप्ति और 'क्षेम' का अर्थ है
साधनके विघ्नोंसे रक्षा।