तिरुक्कुरळ् (सन्त तिरुवल्लुवर - तमिल वेद / उत्तरवेद: धर्म, अर्थ एवं काम सविस्तार हिन्दी भाषान्तर)
Tirukkural of Saint Tiruvalluvar in Hindi
सन्त तिरुवल्लुवर (अनुवादक: खेमानन्द 'रहत') द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याय ११५ तिरुक्कुरळ 257
११५. प्रवाद का परिज्ञान
११४१ (गुप्त प्रेम का) प्रवाद फैलने के फलस्वरूप मेरे प्राण स्थिर हैं,
परन्तु सौभाग्यवश इसे अनेक लोग नहीं जानते ।
११४२. पुष्प सदृश नेत्रोंवाली मेरी प्रेमिका की विशेषता से
अनभिज्ञ होने के कारण इस नगर ने मुझे प्रवाद प्रदान
किया है ।
११४३. नगर के सभी लोगों को ज्ञात प्रवाद क्या मेरे लिए अमूल्य
नहीं है ? इससे वह मुझे प्राप्त न होकर भी मानो प्राप्त
हो गयी ।
११४४. प्रवाद से प्रेम बढ़ता जा रहा है । अन्यथा वह अपना
गुण तजकर सिकुड़ जाता ।
११४५. मद के अधिकाधिक पान से मस्ती बढ़ते जाने के समान
प्रवाद के अधिकाधिक फैलने पर प्रेम भी आनन्दमय होता
जाता है ।
११४६. प्रेमी के दर्शन केवल एक दिन ही हुए, परन्तु उससे उत्पन्न
प्रवाद चन्द्र को सर्प के ग्रसने के समान सर्वत्र फैल गया ।
११४७. प्रेम का यह ज्वर नगर-वासियों के प्रवाद के खाद तथा
माता के क्रुद्ध वचन के जल से खूब बढ़ता जायगा ।
११४८. प्रवाद से प्रेम को शाँत करने का कथन घृत से अग्नि को
शाँत करने के समान है ।
११४९. निर्भय रहने का आश्वासन देकर आज वे ही सब के
सामने लज्जित कर मुझे छोड़ गये हैं तो इस प्रवाद से
क्यों डरूँ ?
११५०. मेरे इच्छित प्रवाद को नगर-वासी फैला रहे हैं । अब
प्रेमी चाहें तो मेरी सहायता करेंगे ।
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