तिरुक्कुरळ् (सन्त तिरुवल्लुवर - तमिल वेद / उत्तरवेद: धर्म, अर्थ एवं काम सविस्तार हिन्दी भाषान्तर)
Tirukkural of Saint Tiruvalluvar in Hindi
सन्त तिरुवल्लुवर (अनुवादक: खेमानन्द 'रहत') द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याय ११४ तिरुक्कुरळ 255
११४. लज्जा का त्याग
११३१. काम की असह्य वेदना से दुखित व्यक्ति के लिए अन्तिम सहारा
'मडल'* से अधिक सबल और कोई है ही नहीं।
११३२. वियोग-सहन में असमर्थ शरीर एवं प्राण लज्जा को दूर हटाकर
मडल-आरोहण का निश्चय कर चुके हैं।
११३३. लज्जो एवं धैर्य युक्त था पूर्व, पर आज मेरे पास प्रेमियों के
चढ़ने का मडल है।
११३४. काम की भयंकर बाढ़ लज्जा एवं धैर्य की मेरी नाव को
बहा ले जाती है।
११३५. माला जैसी श्रृंखलाबद्ध चूड़ियाँ पहनी हुई मेरी प्रेमिका ने मुझे
मडल के साथ सायंकालीन दुःख भी दिया।
११३६. मध्य निशा में भी मडल पर चढ़ने का विचार अवश्य
करता हूँ; मेरी बेचारी आँखें निद्रा रहित हैं।
११३७. समुद्र सदृश काम से पीड़ित होने पर भी मडल पर चढ़े बिना
दुःख को सहनेवाली स्त्री के समान और कोई नहीं है।
११३८. वे मनस्थिति के पारखी नहीं हैं या श्रेष्ठ प्रेमी हैं, इसका विचार
किये बिना काम बन्धन को भूलकर समाज में प्रकट
हो जाता है।
११३९. ऐसा ही मानकर कि मेरे गुप्त-प्रेम से सब अपरिचित हैं,
काम मस्त होकर खुले मार्ग में फिर रहा है।
११४०. मेरे समान प्रेम की पीर को न भुगतने के कारण बुद्धिहीन
मेरी आँखों के सामने ही हँसते हैं।
- ताड़ के पत्तों का बना घोडा जिस पर चढ़कर प्रेमी आत्म-हत्या की
बहिरंग घोषणा करता है।