तिरुक्कुरळ् (सन्त तिरुवल्लुवर - तमिल वेद / उत्तरवेद: धर्म, अर्थ एवं काम सविस्तार हिन्दी भाषान्तर)
Tirukkural of Saint Tiruvalluvar in Hindi
सन्त तिरुवल्लुवर (अनुवादक: खेमानन्द 'रहत') द्वारा
पृष्ठ 202, कुल 334 में से
संदर्भ में पढ़ेंअध्याय ७६ तिरुक्कुरळ 177
४. खाद्य
७६. धन-बल निरूपण
७५१. तुच्छ व्यक्ति को भी ( सम्मानित ) स्थान प्रदान करने की शक्ति
धन के अतिरिक्त और किसी में नहीं है।
७५२. निर्धन का सब अपमान करते हैं और धनवान की सब प्रशंसा
करते हैं।
७५३. धन नामक कभी न बुझनेवाला दीपक ( उसके संग्रहकर्ता के )
अभीष्ट स्थान में जाकर उसकी बाधाओं का नाश कर
डालता है।
७५४. न्याय-संगत निर्दोष रूप से आया हुआ धन धर्म तथा आनन्द
प्रदान करेगा।
७५५. दया एवं प्रेम सहित न आये हुए धन-वैभव से प्रसन्न न होकर
उसे अस्वीकार करो।
७५६. स्वयमेव अथवा चुंगी द्वारा प्राप्त तथा शत्रु-दमन के पश्चात्
संगृहीत धन सम्राट् का होता है।
७५७. स्नेह से उत्पन्न दया नामक शिशु, धन नामक धाय से पोषित
होता है।
७५८. अपना धन हाथ में रखकर कर्म करना टीले पर चढ़कर
हाथी की लड़ाई देखने के समान होता हैं।
८५९. धन-संग्रह करो। शत्रु के अहंकार को काटनेवाला उससे
तेज शस्त्र और कोई नहीं है।
७६०. महत्तम धन का अधिक संग्रह करनेवाले को इतर दोनों
पुरुषार्थ—धर्म एवं काम—एक साथ सरलता से प्राप्त
होंगे।
23