तिरुक्कुरळ् (सन्त तिरुवल्लुवर - तमिल वेद / उत्तरवेद: धर्म, अर्थ एवं काम सविस्तार हिन्दी भाषान्तर)
Tirukkural of Saint Tiruvalluvar in Hindi
सन्त तिरुवल्लुवर (अनुवादक: खेमानन्द 'रहत') द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याय ७१ तिरुक्कुरळ 167
७१. भावज्ञता
७०१. किसी के कहे बिना मुखदर्शन मात्र से भावों को हृदयंगम कर
लेनेवाला सदा के लिये अक्षुण्ण जल समुद्र के मध्य उपस्थित
संसार का एक आभूषण होगा।
७०२. सन्देह किये बिना हृदय की भावना को हृदयंगम कर लेनेवाला
देवता के समान माना जायगा।
७०३. मुखाकृति मात्र से हृदय की भावना को जो समझ ले उसे
(अपने धन, भूमि आदि में से) कोई भाग देकर भी
अपना लो।
७०४. किसी के कहे बिना हृदय की बात को समझ लेनेवाले से
दूसरे व्यक्ति, सम्पत्ति में समान होने पर भी, बुद्धि के कारण
विभिन्न ही ठहरते हैं।
७०५. मुखाकृति आदि से हृदय के भावों को यदि कोई न समझ सके
तो उसके शरीर के अंगों में नेत्रों के होने से क्या प्रयोजन ?
७०६. समीपस्थ वस्तु को प्रतिबिंबित करनेवाले संगमरमर के सदृश हृदय
के भावातिरेक को मुख अभिव्यक्त कर देता है।
७०७. सम्मुख आते ही (मन की) प्रसन्नता या रुष्टता जिसके मुख से
तुरन्त व्यक्त हो जाय उससे अधिक ओछी बुद्धिवाला और कोई
हो सकता है ?
७०८. मुख मात्र को देखकर हृदय के भाव को समझ लेनेवाला प्राप्त
हो जाय तो उसका मुख देखते हुए खड़े हो जाना यथेष्ट है।
७०९. नेत्र के विभिन्न रूपों से भाव को समझ लेनेवाला प्राप्त
हो जाय तो किसी के नेत्र ही (हृदय में उपस्थित) शत्रुता एवं
मित्रता को व्यक्त कर देंगे।
७१०. सूक्ष्म-बुद्धि कहलानेवाले का माप-दण्ड, समीक्षा करने पर,
आँख के अतिरिक्त और कुछ नहीं है।