तिरुक्कुरळ् (सन्त तिरुवल्लुवर - तमिल वेद / उत्तरवेद: धर्म, अर्थ एवं काम सविस्तार हिन्दी भाषान्तर)
Tirukkural of Saint Tiruvalluvar in Hindi
सन्त तिरुवल्लुवर (अनुवादक: खेमानन्द 'रहत') द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याय ७० तिरुक्कुरळ 165
७०. सम्राट् से सहयोग
६९१. अति दूर व अति समीप न रहकर जाड़े में अग्नि में
तपने के समान सम्राट् से सहयोग रखना चाहिए।
६९२. सम्राट् की प्रिय वस्तु की अभिलाषा न करना सम्राट् से सहयोग
प्राप्त व्यक्ति को स्थाई समृद्धि प्रदान करेगा।
६९३. सम्राट् का सहयोग सुरक्षित रखना चाहो तो प्रवल
दोषों से अपने को सर्वथा पृथक् रक्खो। सम्राट् के
क्रुद्ध होने पर उसे कोई समझा नहीं सकता।
६९४. शक्ति-सम्पन्न श्रेष्ठ व्यक्ति के सम्मुख कानाफूसी करने और किसी
को देखकर हँसने से बचे रहना चाहिए।
६९५. (सम्राट् से सहयोग प्राप्त व्यक्ति उनकी) किसी गुप्त बात को
न सुनता है और न वारवार पूछता है। स्वयं रहस्य को
व्यक्त करें तो सुन लेता है।
६९६. सम्राट् के भाव समझकर, समय का विचार करते हुए, प्रिय
एवं इच्छित विषयों को आनन्दप्रद रीति से उनके सामने
व्यक्त करो।
६९७. सम्राट् के प्रिय विषयों को ही कहकर, और निरर्थक
विषयों को उनके पूछने पर भी न कहकर सदा के लिए
त्याग देना चाहिए।
६९८. अल्पवयस्क अथवा वन्धु कह कर सम्राट् का अपमान न करके
अपनी स्थिति के अनुकूल मर्यादा के साथ व्यवहार करना
चाहिए।
६९९. निश्चल, विशुद्ध व बुद्धिमान, 'हम सम्राट् के कृपा-पात्र हैं',
ऐसा विचार कर उनके अप्रिय विषयों को कदापि न करेंगे।
७००. अपने को सम्राट् का चिर-परिचित मानकर दुर्व्यवहार में
प्रवृत्त होनेवाला अधिकार हानिकारक होगा।