तिरुक्कुरळ् (सन्त तिरुवल्लुवर - तमिल वेद / उत्तरवेद: धर्म, अर्थ एवं काम सविस्तार हिन्दी भाषान्तर)
Tirukkural of Saint Tiruvalluvar in Hindi
सन्त तिरुवल्लुवर (अनुवादक: खेमानन्द 'रहत') द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याय ६७ तिरुक्कुरळ 159
६७. कर्म की दृढ़ता
६६१. कर्म की दृढ़ता वस्तुतः व्यक्ति की मानसिक दृढ़ता ही है। शेष
सब पृथक ही ठहरते हैं।
६६२. नीति-निपुणों का निश्चित मत है कि कर्म की दृढ़ता के दो
मार्ग हैं—दोषपूर्ण कर्मों को न करना, तथा किये हुए कर्मों
के कारण अधीर न होना।
६६३. बहादुरी इसी में है कि कर्म के अन्त में ही मर्म व्यक्त हो।
मध्य में बात फूट गयी तो वह असह्य दुःख देगी।
६६४. कहना सब के लिए सरल होता है, पर कहे अनुसार करना अति
दुष्कर होता है।
६६५. सुयश प्राप्त (मन्त्री जैसे) श्रेष्ठ पद में स्थित व्यक्ति के कर्म की
दृढ़ता सम्राट् तक पहुँचकर सर्व-सम्मानित होगी।
६६६. विचारवान (अपने कर्म में) दृढ़ रहें तो वे विचारे हुए पदार्थ को
विचारे हुए रूप में ही प्राप्त करेंगे।
६६७. रूपमात्र को देखकर किसी को तुच्छ न समझ बैठो।
बड़े रथ की घूमनेवाली किल्ली के समान वे हो सकते हैं।
६६८. अविचलित रूप से निश्चित कर्म को अथक परिश्रम से अविलम्ब
करना चाहिए।
६६९. (अन्त में) आनन्दप्रद कर्म को, दुःख आ पड़ने पर भी, सधैर्य
करना चाहिए।
६७०. और किसी प्रकार की दृढ़ता चाहे हो, पर कर्म की दृढ़ता से
रहित व्यक्ति की परवाह लोक न करेगा।