तिरुक्कुरळ् (सन्त तिरुवल्लुवर - तमिल वेद / उत्तरवेद: धर्म, अर्थ एवं काम सविस्तार हिन्दी भाषान्तर)
Tirukkural of Saint Tiruvalluvar in Hindi
सन्त तिरुवल्लुवर (अनुवादक: खेमानन्द 'रहत') द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याय ६१ तिरुक्कुरळ 147
६१. निरालस्य
६०१. कुटुम्ब नामक अक्षय दीपक आलस्य नामक कलंक के
लगते-लगते निस्तेज हो विनाशगत होगा।
६०२. कुटुम्ब को कुटुम्ब बनाये रखने के इच्छुक आलस्य को
विनाशक मानें।
६०३. आलस्य को गोद में लिये रखनेवाले का जन्म जिस कुटुम्ब
में हुआ होता है उसका विनाश उस व्यक्ति से पूर्व होगा।
६०४. आलस्यग्रस्त हो, विशिष्ट प्रयत्न न करनेवाले का कुटुम्ब विनाश
प्राप्त हो, उसमें दोष आ भरने लगेंगे।
६०५. दीर्घसूत्रता, विस्मरण, आलस्य व निद्रा—ये चारों विनाशोन्मुख
व्यक्ति की प्रिय नावें हैं।
६०६. शासक का प्रिय पात्र होने पर भी आलसी श्रेष्ठ लाभ प्राप्त नहीं
कर सकता।
६०७. आलस्यग्रस्त हो, विशिष्ट प्रयत्नशील न रहनेवाले दूसरों के
उपालम्भ भरे तिरस्कृत शब्द सुनेंगे।
६०८. आलस्य कुटुम्ब में स्थान पा गया तो अपने शत्रुओं की दासता
कुटुम्ब में प्रविष्ट करा देगा।
६०९. कुटुम्ब के सम्मान में आया हुआ दोष सबल आलस्य के जाने से
स्वतः नष्ट हो जायगा।
६१०. निरालस्ययुक्त सम्राट् त्रिविक्रम (वामन) द्वारा पार किया हुआ
सम्पूर्ण क्षेत्र एक साथ प्राप्त करेगा।