तिरुक्कुरळ् (सन्त तिरुवल्लुवर - तमिल वेद / उत्तरवेद: धर्म, अर्थ एवं काम सविस्तार हिन्दी भाषान्तर)
Tirukkural of Saint Tiruvalluvar in Hindi
सन्त तिरुवल्लुवर (अनुवादक: खेमानन्द 'रहत') द्वारा
पृष्ठ 170, कुल 334 में से
संदर्भ में पढ़ेंअध्याय ६० तिरुक्कुरळ 145
६०. उत्साह
५९१. उत्साह ही है सम्पत्ति, अन्यथा सम्पत्ति-युक्त होने पर भी क्या वह
अपनी है ?
५९२. उत्साह ही है स्थाई सम्पत्ति । धन स्थाई न रह कर हट
जाता है ।
५९३. जो उत्साह को दृढ़ता के साथ करबद्ध किये रहते हैं वे परिस्थिति
के बिगड़ने पर भी विचलित न होंगे ।
५९४. अविचल उत्साह होनेवाले के पास सम्पन्नता स्वयं मार्ग
पूछकर जाती है ।
५९५. जल (की गहराई) जितनी होती है पुष्प (की नाल) की
लम्बाई । मनुष्य के उत्साह जितनी होती है उसकी ऊँचाई ।
५९६. विचार सदा महत्त्वाकाँक्षा का हो । सिद्ध न होने पर भी
उसे न त्यागो ।
५९७. उत्साहशील व्यक्ति विनाश के समय भी विचलित नहीं होता ;
हाथी तरकस-भर बाण से पीड़ित होने पर भी विचलित न
होकर अपनी महानता को स्थापित करता है ।
५९८. संसार में सबल (व दानशील) होने के आत्मगौरव का आनंद
उत्साहहीन नहीं प्राप्त करेंगे ।
५९९. (उत्साहपूर्ण) व्याघ्र आक्रमण करे तो विशाल-काय एवं तीक्ष्णदंत
होने पर भी हाथी भयभीत होगा ।
६००. उत्साह की प्रचुर मात्रा ही एक का बल है, अन्यथा
वृक्ष और मानव के रूपमात्र का अन्तर उनमें
रहता है ।
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