सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
तिरुक्कुरळ् (सन्त तिरुवल्लुवर - तमिल वेद / उत्तरवेद: धर्म, अर्थ एवं काम सविस्तार हिन्दी भाषान्तर)

तिरुक्कुरळ् (सन्त तिरुवल्लुवर - तमिल वेद / उत्तरवेद: धर्म, अर्थ एवं काम सविस्तार हिन्दी भाषान्तर)

Tirukkural of Saint Tiruvalluvar in Hindi

सन्त तिरुवल्लुवर (अनुवादक: खेमानन्द 'रहत') द्वारा

DevanagariHindipublished334 पृष्ठ

पृष्ठ 164, कुल 334 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 164

अध्याय ५७ तिरुक्कुरळ 139
५७. भयकंपित न करना
५६१. दोष का ध्यान से विवेचन करके भविष्य में उसके निवारणार्थ
उचित दण्ड देनेवाला ही सम्राट् है।
५३२. स्थाई समृद्धि की अक्षयता जिनको प्रिय हो उन्हें चाहिए कि
असीम दण्ड का भय दिखाकर ससीम व्यवहार करें।
५६३. भयकंपित व्यवहार से युक्त क्रूर शासक कोई हो तो उसका
विनाश शीघ्र होकर रहेगा।
५६४. प्रजा द्वारा 'क्रूर शासक' कहकर संबोधित होनेवाले सम्राट् की
आयु घटकर, शीघ्र विनाश को प्राप्त होगा।
५६५. सुलभ और प्रिय-दशन न होनेवाले की विशद् सम्पत्ति मानो
भूत-प्रेम की देख-रेख में रहती है।
५६६. क्रूर वक्ता व निर्दय की विशद्-सम्पत्ति अस्थाई होकर वहीं
विनाश प्राप्त होगी।
५६७. कटु वचन व अन्यायपूर्ण दण्ड सम्राट् के विजय-साधक बल का
विनाश करनेवाला आरा है।
५६८. स्वजनों की सम्मति के बिना (असफल होने पर) क्रोधित
हो, क्रूर व्यवहार करनेवाले सम्राट् की सम्पत्ति शीघ्र ही
क्षतिग्रस्त होगी।
५६९. समय पर अपनी सुरक्षा न करनेवाला भयकम्पित हो शीघ्र विनाश
प्राप्त होगा।
५७०. क्रूर शासन अशिक्षितों का आश्रय ग्रहण करेगा। इसके अतिरिक्त
और भार भूमि के लिए है ही नहीं।