विवाह वृन्दावनम् (पं. सीताराम झा ज्योतिष टीका - विवाह संस्कार, अष्टकूट गुण-मिलान एवं मुहूर्त विज्ञान सटीक)
Vivaha Vrindavanam: Vivaha Sanskara, Ashtakuta Guna Milana evam Muhurta Vigyan
केशवार्कमहोदय (टीकाकार: पं. सीताराम झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें८२ विवाहवृन्दावनम्- [ कुण्डलिका-
भा०- विवाह लग्न में गुरु हो तो स्त्री को चिरजीविनी बनाता है, शुक्र हो तो
अत्यन्त काम और सौभाग्य से युक्ता, चन्द्रमा और मंगल हो तो यमराज की स्त्री
के पास जानेवाली, बुध हो तो स्वामी में भक्ति रखने वाली, शनि हो तो दुष्ट
स्वभाव वाली और सूर्य लग्न में हो तो अग्नि तथा अस्त्र आदि से मरने वाली स्त्री
को बनाता है ॥ १ ॥
अथ द्वितीयभावगतग्रहाणां फलानि-
नितान्तधनिनीं धने सितसितांशुजीवेन्दुजा
रुजादहनदस्युभिर्विधुरितां धरानन्दनः ।
सुतेष्वपि मितम्पचां मलिनमूर्तिमर्कात्मजः
स्त्रियं सहजदुर्भागां जनयति द्युतीनां पतिः ॥ २ ॥
सं०-धने द्वितीयभावे सित-सितांशु-जीवेन्दुजाः स्त्रियं ( विवाहितां
कन्यां ) नितान्तधनिनीं (अतिधनवतीं) जनयन्ति । धरानन्दनः (मङ्गलः)
रुजा-दहन-दस्युभिर्विधुरितां दुःखितां जनयति । अर्कात्मजः (शनिः)
सुतेषु (आत्मजेषु) अपि मितम्पचां कृपणां मलिनमूर्तिं जनयति ।
द्युतीनां पतिः (सूर्यः) सहजदुर्भागां स्वभावदुर्भागां जनयति ॥ २ ॥
भा०-विवाह लग्न से द्वितीय भाव में शुक्र, चन्द्रमा, बृहस्पति और बुध ये
कन्या को अत्यन्त धनवती बनाते हैं । मंगल रोग, अग्नि और चोरों के भय से
पीड़ित बनाता है । शनि द्वितीय भाव में हो तो अपने पुत्रों के प्रति भी कृपण
बुद्धि वाली और मलिन शरीरवाली स्त्री को बनाता है । और सूर्य द्वितीय भाव में
हो तो स्वभाव से ही दुर्भागा स्त्री होती है ॥ २ ॥
अथ तृतीयभावगतग्रहाणां फलानि-
इनशनी सहजे सधनां वधूं तनुधनां सचिवः शुभगां शशी ।
सुकृतिनीं कुरुतः कुजसोमजौ नयति देवरि देवरिपूपनीः ॥ ३ ॥
सं०-सहजे तृतीयभावे 'स्थितौ' इन-शनी सूर्य-शनैश्चरौ वधूं स्त्रियं
सधनां धनयुक्तां कुरुतः । सचिवो बृहस्पतिः तनुधनां स्वल्पधनवतीं, शशी
सुभगां करोति । कुजसोमजौ (मंगल-बुधौ) सुकृतिनीं पुण्यवतीं कुरुतः ।
तथा देवरिपूपनीः ( देवरिपून् दैत्यान् उपनयत्यसौ देवरिपूपनीः शुक्रः )
वधूं स्त्रियं देवरि (देवरे) नयति प्रापयति देवरगामिनीं करोतीत्यर्थः ॥३॥