तेनालीराम की अनोखी दुनिया (बुद्धिमत्ता एवं हास्य कथाएँ)
पण्डित तेनाली रामकृष्णन / लोक संकलन द्वारा
स्रोत: तेनालीराम की अनोखी दुनिया (बुद्धिमत्ता एवं हास्य कथाएँ) · भारतीय लोक साहित्य संकलन · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 113, कुल 118 में से
संदर्भ में पढ़ेंइसलिए हिंसा से प्रेरित नहीं हैं। जीवन को भोगने की चाह जिस दिन पनपेगी, हम भी वैसे
हो जा सकते हैं।“
तेनाली राम की बातों से सभाकक्ष में बैठा बाबर का दूत बहुत प्रभावित हुआ। उसने
सभाकक्ष में खड़े होकर तालियाँ बजाईं।
महाराज कृष्णदेव राय का ध्यान अचानक दूत की ओर गया। उनकी तन्द्रा भंग हुई और
कर्तव्य-बोध के वशीभूत होकर उन्होंने दूत से विजय- नगर आने का कारण पूछा।
दूत ने बादशाह बाबर का एक सन्देश पढ़कर महाराज कृष्णदेव राय को सुनाया। इस पत्र
का आशय था कि बादशाह बाबर ने विजयनगर को अपने मित्र राज्य में सम्मिलित होने का
आमंत्रण भेजा है तथा उन्हें विश्वास है कि उनका यह आमंत्रण स्वीकार किया जाएगा।
महाराज कृष्णदेव राय ने दूत को एक स्मृतिचिह्न भेंट कर अपने दरबार में सम्मानित
किया तथा उसे अतिथिशाला में विश्राम करने के लिए भेज दिया। सभा विसर्जित करने के
बाद महामंत्री और तेनाली राम को साथ लेकर मंत्रणा कक्ष में चले गए। तीनों के बीच
विचार-विमर्श के बाद यह निर्णय लिया गया कि कल दूत को इस सन्देश के साथ विदा कर
दिया जाए कि ‘हम इस आमंत्रण के लिए आभारी हैं-शीघ्र ही हम अपने दूत के माध्यम से
अपने निर्णय से अवगत कराएँगे।’
दूसरे दिन दूत विजयनगर से दिल्ली के लिए रवाना हो गया। इसके बाद फिर महाराज
कृष्णदेव राय अपने महामंत्री के साथ मंत्रणा करने बैठ गए। इस चर्चा में तय हुआ कि
बादशाह बाबर का प्रस्ताव स्वीकार नहीं करने का कोई कारण नहीं है। विजयनगर का
इतिहास साक्षी है कि सुदूर अतीत से यह एक ऐसा राज्य रहा है जो ‘न काहू से दोस्ती, न
काहू से बैर’ की नीति पर अमल करता रहा है। मित्रता सन्देश तो औपचारिकता है। इस
सन्देश का एक अर्थ तो यह है कि भविष्य में न हम आपकी राह में आएँगे और न आप
हमारा कहीं विरोध करेंगे। एक-दूसरे के प्रति परस्पर सहयोग की भावना ही तो इस
आमंत्रण में निहित है इसलिए इसे स्वीकार कर लेना उचित है।
इस निष्कर्ष पर पहुँचने के बाद महाराज कृष्णदेव राय ने महामंत्री को विदा किया और
प्रहरी को भेजकर तेनाली राम को अविलम्ब राजमहल आकर उनसे मिलने को कहलवाया।
जिस समय तेनाली राम ने राजमहल में प्रवेश किया उस समय शाम ढल चुकी थी।
आसमान पर अँधेरे का सुरमई चादर बिछ चुका था जिन पर सितारे टिमटिमाने लगे थे।
राजमहल के प्रहरियों को सम्भवतः महाराज कृष्णदेव राय ने पहले से ही निर्देश दे रखा था
कि जब तेनाली राम आए, उसे अविलम्ब उनके कक्ष तक पहुँचा दिया जाए। कक्ष में
महाराज विचारमग्न मुद्रा में टहल रहे थे।