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तेनालीराम की अनोखी दुनिया (बुद्धिमत्ता एवं हास्य कथाएँ)

तेनालीराम की अनोखी दुनिया (बुद्धिमत्ता एवं हास्य कथाएँ)

पण्डित तेनाली रामकृष्णन / लोक संकलन द्वारा

स्रोत: तेनालीराम की अनोखी दुनिया (बुद्धिमत्ता एवं हास्य कथाएँ) · भारतीय लोक साहित्य संकलन · 1950 (उद्गम)

DevanagariHindipublished118 पृष्ठ

पृष्ठ 112, कुल 118 में से

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संगत और मन को भा जानेवाली बातें सुनने को मिली थीं इसलिए वे तेनाली राम की
तर्कसंगत बातें रुचि से सुनने में लगे रहे।
दूत को दरबार में लाकर उचित स्थान पर बैठा दिया गया।
तेनाली राम की चर्चा जारी रही। वह अपनी रौ में बोल रहा था, “महाराज! मान्यता है
कि अनुभव प्राप्त करना श्रेष्ठ कर्म है किन्तु महाराज, जीवन का अनुभव ही तो जीवन की
सहज इच्छाओं पर सीमा रेखाएँ खींचने लगता है कि ऐसा जीवन ठीक है और वैसा जीवन
ठीक नहीं है। वास्तविकता यह है कि अनुभव से परिपक्व व्यक्ति वृद्ध हो चुका होता है और
बहुत सारी स्वाभाविक क्रियाओं के लिए उसके पास शक्ति नहीं बची रहती। इसलिए ऐसा
बल क्षीण मानक दूसरों के लिए निषेध और वर्जनाएँ और आरोपित करने लगता है कि ऐसा
करना उचित है अथवा वैसा करना अनुचित है जबकि मेरी दृष्टि में जीवन की स्वाभाविक
वृत्तियों के लिए निषेध-रेखा खींचने जैसी हिंसक क्रिया कोई दूसरी नहीं हो सकती।...
महाराज, इस हिंसा से पूरा समाज, पूरा देश, सम्पूर्ण मानव समुदाय लिप्त है। मनुष्य जीवन
जीने की कामना में प्रयासरत रह नहीं पाता है और जीवन भोगने की कामना में हिंसक
होता जाता है। जंगल में शेर, बाघ, तेंदुआ, चीता आदि हिंस्र जन्तु कहे जाते हैं मगर ये
वस्तुतः हिंसा नहीं करते। भोजन के लिए वे प्राकृतिक रूप से जो प्रयास कर सकते हैं वही
करते हैं इसलिए उनके भोजन करने की प्राकृतिक क्रिया को हिंसा नहीं कह सकते किन्तु
सत्ता के मद में जब कोई शासक किसी दूसरे राज्य पर आक्रमण करता है तब यह हिंसक
घटना हो जाती है। आम तौर पर ऐसी घटनाओं में ऐसे लोग या ऐसे राष्ट्र संलग्न होते हैं
जिनके पास साधनों की अधिकता होती है। ऐसे ही मनुष्य राष्ट्र जीवन जीने की क्रियाओं को
छोड़कर जीवन भोगने की लिप्सा की ओर प्रेरित होते हैं। जैसे-अभी कुछ दिन पहले ही
हमारे पड़ोसी राज्य ‘सप्तद्वीप नवखंड’ ने हम पर आक्रमण कर दिया था किन्तु सबल सेना
और प्रचुर साधन होते हुए भी ‘सप्तद्वीप नवखंड’ के राजा को पराजित होना पड़ा। उसके
राजा को हमने बन्दी बनाया। कारण क्या था? क्या हम अतिमानव हैं? बहुत बलशाली हैं?
नहीं! ऐसा मानने का हमारे पास कोई कारण नहीं है। महाराज! सच्ची बात यह है कि
विजयनगर के लोग अनवरत जीवन जीने के लिए प्रयासरत रहते हैं। विजयनगर के राजा
को भी इसके लिए अपनी प्रजा की तरह ही प्रयास करना पड़ता है। हमारे पास थोड़ा है
और थोड़ा चाहिए वाली स्थिति बनी रहती है। इसलिए विजयनगर की प्रजा में जिजीविषा
है। हमारे सशस्त्र बल के जवान भी हमारी प्रजा की सन्तानें हैं इसलिए उनमें भी
जिजीविषा है। यही उत्कट जिजीविषा अन्ततः हमारी जीत का कारण बनी। हममें युयुत्सा
नहीं थी। युद्ध की इच्छा नहीं थी फिर भी हम जीते। किन्तु सप्तद्वीप नवखंड के राजा युयुत्सु
थे। युद्ध की इच्छा उनमें थी। उनकी सेना युद्ध के लिए तत्पर और आक्रामक थी फिर भी वे
हार गए। महाराज, हमारी जीत और उनकी हार में भी मेरी हिंसा की व्याख्या ही काम
कर रही है। सप्तद्वीप नवखंड के राजा ने और वहाँ की सेना ने इतना वैभव एकत्रित कर
लिया है कि उन्हें जीवन जीने की जगह जीवन भोगने की प्रवृत्ति प्रेरित करने लगी है। इसी
प्रवृत्ति के कारण वे हिंसा के लिए प्रेरित हुए। हम जीवन जीने की प्रवृत्ति के अधीन हैं