तर्कसंग्रह एवं न्यायबोधिनी (अन्नम्भट्ट - पं. केदारनाथ त्रिपाठी सान्वय सटीक)
Tarkasangraha with Nyayabodhini of Annambhatta by Kedarnath Tripathi
अन्नम्भट्ट द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंन्यायबोधिनी-कलासंवलित- ५५
साध्याभावव्याप्तो हेतुविरुद्धः । यथा शब्दो नित्यः कृतकत्वात्
जो हेतु साध्य से व्याप्त न होकर साध्याभाव से व्याप्त हो, वह विरुद्धनामक
न्यायबोधिनी
अनुपसंहारिणं लक्षयति—अन्वयेति । उभयत्र दृष्टान्ताभावादन्वयव्याप्ति-
ज्ञानव्यतिरेकव्याप्तिज्ञानोभयसामग्री नास्तीत्यर्थः । सर्वस्यैव पक्षत्वात्पक्षा-
तिरिक्ताप्रसिद्धेरिति भावः । किंचिद्विशेष्यकनिश्चयाविषयसाध्यकत्वे सति
किञ्चिद्विशेष्यकनिश्चयाविषयसाध्याभावकत्वमेवानुपसंहारित्वम् । एतदीय-
ज्ञानस्य व्याप्तिसंशयजननद्वारा व्याप्तिज्ञानप्रतिबन्धः फलम् ।
वस्तुतस्तु अत्यन्ताभावाप्रतियोगिसाध्यादिकत्वमेवानुपसंहारित्वमिति
बोध्यम् ।
हिन्दी-कला
अनुमिति में अपेक्षित अन्वयदृष्टान्त या व्यतिरेकदृष्टान्त इन दोनों से रहित
जो हेतु, वह अनुपसंहारी है । जैसे—'सर्वमनित्यं प्रमेयत्वात्' यहाँ सब कुछ पक्ष बन
गया है । इसलिये पक्ष से इतर न कोई सपक्ष बच गया है कि अन्वयदृष्टान्त मिले
और न कोई विपक्ष बच गया है कि कोई व्यतिरेकदृष्टान्त मिले । इस प्रकार दोनों
दृष्टान्त का अभाव होने के कारण अन्वयव्याप्तिज्ञान या व्यतिरेकव्याप्ति-
ज्ञान किसी की भी सामग्री नहीं मिल पाती है । क्योंकि सबके पक्ष बन जाने से
पक्षातिरिक्त अप्रसिद्ध है ।
अनुपसंहारी का परिष्कृत लक्षण बोधिनीकार कहते हैं—किञ्चिद्विशेष्यक
इत्यादि । अर्थात् किसी को विशेष्य बनाकर होने वाले निश्चय का अविषय साध्य हो,
साथ ही किसी को विशेष्य बनाकर होने वाले निश्चय का अविषय साध्याभाव भी
हो, तब वहाँ का हेतु अनुपसंहारी होता है । तात्पर्य यह है कि कहीं भी न साध्य का
निश्चय हो और न साध्याभाव का निश्चय हो, उस स्थिति में वहाँ का हेतु अनुपसंहारी
होगा । "सर्वम् अनित्यं प्रमेयत्वात्” यहाँ यही स्थिति है । क्योंकि सब के पक्ष बन
जाने से सर्वत्र अनित्यत्व का सन्देह ही है, निश्चय कहीं नहीं है । इस हेत्वाभास के
ज्ञान का फल व्याप्ति में संशय पैदा कर व्याप्तिज्ञान का प्रतिबन्ध कर देना है ।
वस्तुस्तु साध्य-हेतु आदि का अत्यन्ताभाव का अप्रतियोगी होना ही अनुपसंहारी
का लक्षण है । इसके अनुसार 'सर्वमनित्यं प्रमेयत्वात्' के समान 'इदं वाच्यं ज्ञेयत्वात्'
इत्यादि का अनुपसंहारी-हेत्वाभास में अन्तर्भाव हो जायगा । अनुपसंहारी के इस लक्षण
की दृष्टि से 'साध्याभाववदवृत्तित्वम्' यही व्याप्ति का स्वरूप मानना युक्त है । क्योंकि
केवलान्वयीस्थल में दुष्ट-हेतु होने के कारण उसमें व्याप्ति का न होना अभीष्ट ही है ।
अतः सिद्धान्तलक्षण बनाकर वहाँ व्याप्तिलक्षण ले जाने का प्रयास अनावश्यक है ।