तर्कसंग्रह एवं न्यायबोधिनी (अन्नम्भट्ट - पं. केदारनाथ त्रिपाठी सान्वय सटीक)
Tarkasangraha with Nyayabodhini of Annambhatta by Kedarnath Tripathi
अन्नम्भट्ट द्वारा
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न्यायबोधिनी
द्रव्यग्राहकाणीन्द्रियाणि चक्षुस्त्वङ् मनांसि त्रीण्येव, अन्यानि घ्राणरसन-
श्रवणानि गुणग्राहकाणि । अतस्त्वगिन्द्रियस्थले द्रव्यवृत्तिलौकिकविषयता-
सम्बन्धेन त्वाचप्रत्यक्षत्वावच्छिन्नं प्रति त्वक्संयोगस्य हेतुता । एवं द्रव्यसम-
वेतत्वाचप्रत्यक्षत्वावच्छिन्नं प्रति त्वक्संयुक्तसमवायस्य हेतुता । द्रव्यसमवेत-
समवेतोष्णत्वशीतत्वादिजातिस्पार्शनप्रत्यक्षे त्वक्संयुक्तसमवेतसमवायस्य
हेतुता । एवमात्ममानसप्रत्यक्षे मनःसंयोगस्य हेतुता । आत्मसमवेतसुखादि-
मानसप्रत्यक्षे मनःसंयुक्तसमवायस्य हेतुता । आत्मसमवेतसमवेतसुखत्वादि-
मानसप्रत्यक्षे मनःसंयुक्तसमवेतसमवायस्य हेतुता । रसनघ्राणयोस्तु रसगन्ध-
तद्गतजातिग्राहकत्वेन द्वितीयतृतीययोः सन्निकर्षयोरेव तत्र हेतुता वाच्या ।
हिन्दी-कला
जो समवेत रूपादि, उसमें रहनेवाली जो लौकिकविषयता उस सम्बन्ध से होनेवाले
चाक्षुष-प्रत्यक्ष के प्रति अर्थात् द्रव्यसमवेतरूपादिविषयक लौकिक चाक्षुषप्रत्यक्ष के
प्रति चक्षुःसंयुक्तसमवायनामक सन्निकर्ष हेतु होता है । ऐसे ही द्रव्यसमवेत रूपादि,
उसमें समवेत रूपत्वादि में रहनेवाली जो लौकिकविषयता, उस सम्बन्ध से होनेवाले
चाक्षुष के प्रति अर्थात् रूपत्वादिविषयक लौकिक चाक्षुष-प्रत्यक्ष के प्रति चक्षुःसमवेत-
समवाय सन्निकर्ष हेतु होता है ।
द्रव्य का ग्रहण कराने वाली तीन ही इन्द्रियां होती हैं—चक्षुः त्वक् और मन ।
शेष तीन इन्द्रियां --- घ्राण रसना और श्रोत्र तो गुणका ग्रहण कराती हैं द्रव्य का
नहीं । अतः चक्षुः के समान त्वगिन्द्रिय-स्थल में भी द्रव्यविषयक लौकिक त्वाच-
प्रत्यक्ष के प्रति त्वक्संयोग कारण है । तथा द्रव्यसमवेत जो स्पर्शादि गुण, तद्विषयक
लौकिक त्वाच-प्रत्यक्ष के प्रति त्वक्संयुक्तसमवाय सन्निकर्ष कारण होता है। इसी
प्रकार द्रव्यसमवेत जो स्पर्शादि, उसमें समवेत जो शीतलत्वादि जाति, उसके
लौकिक त्वाच-प्रत्यक्ष के प्रति त्वक्संयुक्तसमवेतसमवायनामक सन्निकर्ष कारण
होता है ।
इसी प्रकार आत्मविषयक मानस प्रत्यक्ष के प्रति आत्मा के साथ मन का संयोग
हेतु होता है । तथा आत्मसमवेतसुखादि के मानस प्रत्यक्ष के प्रति मनःसंयुक्त-
समवाय हेतु होता है । तथा आत्म-समवेतसुखादिसमवेतसुखत्वादि जाति के
मानस प्रत्यक्ष के प्रति मनःसंयुक्तसमवेतसमवायनामक सन्निकर्ष हेतु होता है ।
रसनेन्द्रिय और घ्राणेन्द्रिय तो रस और गन्ध गुण का तथा तद्गत रसत्व-
गन्धत्वादि जाति की ही ग्राहिका होती हैं, अतः वहाँ संयोग-सन्निकर्ष को छोड़कर
संयुक्तसमवाय एवं संयुक्तसमवेतसमवायनामक द्वितीय और तृतीय सन्निकर्ष ही
कारण होते हैं ।