तर्कसंग्रह एवं न्यायबोधिनी (अन्नम्भट्ट - पं. केदारनाथ त्रिपाठी सान्वय सटीक)
Tarkasangraha with Nyayabodhini of Annambhatta by Kedarnath Tripathi
अन्नम्भट्ट द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंन्यायबोधिनी-कलासंवलितः ३५
प्रत्यक्षज्ञानहेतुरिन्द्रियार्थसन्निकर्षः षड्विधः—संयोगः, संयुक्त-
समवायः, संयुक्तसमवेतसमवायः, समवायः, समवेतसमवायो, विशे-
षणविशेष्यभावश्चेति ।
चक्षुषा घटप्रत्यक्षजनने संयोगः सन्निकर्षः ।
घटरूपप्रत्यक्षजनने संयुक्तसमवायः सन्निकर्षः, चक्षुःसंयुक्ते घटे
रूपस्य समवायात् ।
रूपत्वसामान्यप्रत्यक्षे संयुक्तसमवेतसमवायः सन्निकर्षः, चक्षुः-
संयुक्ते घटे रूपं समवेतं, तत्र रूपत्वस्य समवायात् ।
प्रत्यक्षज्ञान का हेतुभूत इन्द्रिय और अर्थ का सन्निकर्ष छ प्रकार का होता है—
संयोग, संयुक्तसमवाय, संयुक्तसमवेतसमवाय, समवाय, समवेतसमवाय और विशेषण-
विशेष्यभाव ।
चक्षुः इन्द्रिय से घट का प्रत्यक्ष करने में संयोग संनिकर्ष कारण होता है ।
चक्षुः इन्द्रिय से घट के रूप का प्रत्यक्ष करने में संयुक्तसमवाय संनिकर्ष
कारण होता है । क्योंकि चक्षु से संयुक्त घट में रूप समवायसम्बन्ध से है ।
चक्षुः से घटरूपगत रूपत्वसामान्य ( जाति ) का प्रत्यक्ष करने में संयुक्तसमवेत-
समवायसम्बन्ध कारण है । क्योंकि चक्षुःसंयुक्त घट में रूप समवेत है और
उस रूप में रूपत्वका समवाय है । अर्थात् रूप में रूपत्व समवायसम्बन्ध से
रहता है ।
न्यायबोधिनी
चाक्षुषादिषड्विधप्रत्यक्षकारणीभूतान् षड्विधसन्निकर्षान्विभजते—
संयोग इत्यादि । द्रव्यवृत्तिलौकिकविषयतासम्बन्धेन चाक्षुषत्वावच्छिन्नं प्रति
चक्षुःसंयोगस्य कारणत्वम् । द्रव्यसमवेतवृत्तिलौकिकविषयतासम्बन्धेन चाक्षु-
षत्वावच्छिन्नं प्रति चक्षुःसंयुक्तसमवायस्य हेतुत्वम् । द्रव्यसमवेतसमवेतवृत्ति-
लौकिकविषयतासम्बन्धेन चाक्षुषत्वावच्छिन्नं प्रति चक्षुःसंयुक्तसमवेतसम-
वायस्य हेतुत्वम् ।
हिन्दी-कला
और ब्राह्मणत्वनिष्ठा प्रकारता है, अतः तादृशप्रकारताशाली होने के कारण उक्त ज्ञान
सविकल्पक है ।
चाक्षुष रासन घ्राणज आदि छै प्रकार के प्रत्यक्षों के कारणभूत छै प्रकार के
सन्निकर्षों का विभाजन मूल में करते हैं — संयोग, संयुक्तसमवाय आदि । इनमें द्रव्य-
वृत्तिलौकिकविषयतासम्बन्ध से होनेवाले चाक्षुष प्रत्यक्ष के प्रति अर्थात् द्रव्यविषयक
लौकिक चाक्षुष-प्रत्यक्ष के प्रति चक्षुःसंयोगरूप सन्निकर्ष कारण होता है । एवं द्रव्य में