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सर्वकोश
तर्कसंग्रह एवं न्यायबोधिनी (अन्नम्भट्ट - पं. केदारनाथ त्रिपाठी सान्वय सटीक)

तर्कसंग्रह एवं न्यायबोधिनी (अन्नम्भट्ट - पं. केदारनाथ त्रिपाठी सान्वय सटीक)

Tarkasangraha with Nyayabodhini of Annambhatta by Kedarnath Tripathi

अन्नम्भट्ट द्वारा

DevanagariHindipublished199 पृष्ठ

पृष्ठ 33, कुल 199 में से

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पृष्ठ 33

१४ तर्कसंग्रहः [ प्रत्यक्ष परिच्छेदः
रसनग्राह्यो गुणो रसः । स च मधुराम्ललवणकटुकषायतिक्त-
भेदात् षड्विधः । पृथिवीजलवृत्तिः । तत्र पृथिव्यां षड्विधः । जले
मधुर एव ।
घ्राणग्राह्यो गुणो गन्धः । स च द्विविधः । सुरभिरसुरभिश्च ।
पृथिवीमात्रवृत्तिः ।
त्वगिन्द्रियमात्रग्राह्यो गुणः स्पर्शः । स च त्रिविधः, शीतोष्णा-
ऽनुष्णाऽशीतभेदात् । पृथिव्यप्तेजोवायुवृत्तिः । तत्र शीतो जले ।
उष्णस्तेजसि । अनुष्णाऽशीतः पृथिवीवाय्वोः ।
रसना-इन्द्रिय से ग्रहण किया जानेवाला गुण रस है। और वह मधुर (मीठा)
अम्ल (खट्टा) लवण (नमकीन) कटु (कडुआ) कषाय (कसैला) तिक्त (तीता)
के भेद से छः प्रकार का होता है। रस-गुण पृथिवी और जल में रहता है। पृथिवी में
पूर्वोक्त छहों प्रकार का रस रहता है। जल में केवल मधुर रस रहता है।
घ्राण इन्द्रिय से ग्रहण किया जाने वाला गुण गन्ध है। वह दो प्रकार का होता
है—सुरभि (सुगन्ध) और असुरभि (दुर्गन्ध) गन्ध-गुण केवल पृथिवी में
रहता है।
त्वगिन्द्रिय (त्वचा इन्द्रिय) मात्र से ग्रहण किया जानेवाला गुण स्पर्श है। वह
शीत-उष्ण और अनुष्णाशीत भेद से तीन प्रकार का होता है। स्पर्श-गुण पृथिवी-जल-
तेज और वायु में रहता है। उनमें शीतस्पर्श जल में रहता है, उष्णस्पर्श तेज में
रहता है और अनुष्णाशीत (न उष्ण न शीत) स्पर्श पृथिवी और वायु में
रहता है।
हिन्दी-कला
एवं प्रभाघटसंयोग में तथा घटपटसंयोग में एक ही संयोगत्व जाति है। ऐसी
स्थिति में प्रभा-घटसंयोग के चक्षुर्मात्रग्राह्यजातिमान् गुण नहीं होने से प्रभा-घट-
संयोग में अतिव्याप्ति न होगी। अतः इस जातिघटित लक्षणपक्ष में गुणपद को
विशेषगुणपरक मानने की कोई आवश्यकता नहीं है।
इस जातिघटितलक्षण में भी 'गुणत्व' पद देना ही होगा, अन्यथा सुवर्ण में रूप-
लक्षण की अतिव्याप्ति हो जायगी। क्योंकि सुवर्ण में रहनेवाली सुवर्णत्वजाति
चक्षुर्मात्रग्राह्य जाति है। रूप के समान सुवर्ण के भी चक्षुर्मात्रग्राह्यजातिमान्
होने से उसमें रूपलक्षण की अतिव्याप्ति का वारण करने के लिये 'गुणत्व' पद देना
आवश्यक है।
रूप के समान ही रसादि के लक्षण में भी विशेषणभाग न देने पर लक्ष्य से
भिन्न गुण में अतिव्याप्ति हो जायगी तथा विशेष्यभाग न देने पर लक्ष्यमात्र में

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