तर्कसंग्रह एवं न्यायबोधिनी (अन्नम्भट्ट - पं. केदारनाथ त्रिपाठी सान्वय सटीक)
Tarkasangraha with Nyayabodhini of Annambhatta by Kedarnath Tripathi
अन्नम्भट्ट द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१५२ तर्कसंग्रहः [ प्रत्यक्षपरिच्छेदः
अनुभवस्य किं लक्षणम्, के च भेदाः ?—
तद्भिन्नं ज्ञानमनुभवः । स द्विविधः—यथार्थोऽयथार्थश्च ।
यथार्थानुभवस्य किं लक्षणम् ?—
तद्वति तत्प्रकारकोऽनुभवो यथार्थः । ( यथा रजते इदं रजत-
मिति ज्ञानम् ) सैव प्रमेत्युच्यते ।
पदकृत्यम्
संस्कारमात्रजन्यत्वं विवक्षणीयम् । क्वचित्तथैव पाठः । न चैवं सत्यसम्भवः,
तस्य संस्कारजन्यत्वे सतीन्द्रियार्थसंनिकर्षजन्यार्थकत्वात् ।
तदिति । स्मृतित्वावच्छिन्नभिन्नमित्यर्थः । तेन यत्किञ्चित्स्मृतिभिन्नत्वस्य
स्मृतौ सत्त्वेऽपि न क्षतिः । घटादावतिव्याप्तिवारणाय ज्ञानमिति । स्मृति-
वारणाय तद्भिन्नमिति ।
तद्वतीति । 'तद्वति तत्प्रकारो यस्य स तथेत्यर्थः । तद्वद्विशेष्यकतत्प्रकारक
इति यावत् । स्मृतिवारणायानुभव इति । अयथार्थानुभववारणाय तद्वतीति ।
निर्विकल्पकेऽतिव्याप्तिवारणाय तत्प्रकारक इति ।
हिन्दी
ज्ञानमें अतिव्याप्ति होने लगेगी, अतः उसके निवारणके लिये संस्कारजन्यत्वविशेषण
दिया । संस्कारजन्य प्रत्यभिज्ञाज्ञान ( "स एवायं श्यामः" ) भी होता है, अतः उसमें
अतिव्याप्तिवारणार्थ मात्रपद देना चाहिये । क्योंकि प्रत्यभिज्ञाज्ञानमें संस्कारके साथ
साथ इन्द्रियसन्निकर्षके भी कारण होनेसे संस्कारमात्रजन्यत्व नहीं है । कहीं तो मूलमें
मात्रपदके सहित ही पाठ है ।
“किन्तु मात्रपदका सन्निवेश करनेपर असम्भवदोष हो जायगा, क्योंकि स्मृति भी
संस्कारमात्रसे जन्य नहीं होती, किन्तु आत्मा और मन भी कारण होता है” ऐसी
आशङ्का नहीं होगी । क्योंकि मात्रपदका अभिप्राय यह है कि संस्कारजन्य होते हुए
इन्द्रियार्थसन्निकर्षसे अजन्य हो । ऐसा होनेसे प्रत्यभिज्ञामें अतिव्याप्ति भी नहीं हुई
और स्मृतिमें आत्मा और मनके भी कारण होनेसे असंभव भी नहीं हुआ ।
१. 'तद्वति' यहां सप्तमीविभक्तिका अर्थ है विशेष्यत्व । इसलिये लक्षणका
स्वरूप हुआ—तद्वद्विशेष्यक होते हुए तत्प्रकारक जो अनुभव, वह यथार्थ है । अर्थात्
जिस अनुभवमें कोई विशेष्य हो ओर कोई प्रकार ( विशेषण ) हो तथा वह विशेष्य
तद्वत् अर्थात् विशेषणसे युक्त हो, वह अनुभव यथार्थ होता है । अयथार्थ अनुभवमें
विशेष्य और विशेषण दोनों होते हैं, किन्तु वहां विशेष्य विशेषणरहित होता है, अतः
उसमें लक्षणकी अतिव्याप्ति नहीं हुई । निर्विकल्पकज्ञान निष्प्रकारक होता है, अतः
तत्प्रकारकपदके देनेसे उसमें अतिव्याप्ति नहीं हुई ।