सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
तर्कसंग्रह एवं न्यायबोधिनी (अन्नम्भट्ट - पं. केदारनाथ त्रिपाठी सान्वय सटीक)

तर्कसंग्रह एवं न्यायबोधिनी (अन्नम्भट्ट - पं. केदारनाथ त्रिपाठी सान्वय सटीक)

Tarkasangraha with Nyayabodhini of Annambhatta by Kedarnath Tripathi

अन्नम्भट्ट द्वारा

DevanagariHindipublished199 पृष्ठ

पृष्ठ 163, कुल 199 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 163

१४६ तर्कसंग्रहः [ प्रत्यक्षपरिच्छेदः
तत्रेश्वरः सर्वज्ञः परमात्मा एक एव । जीवस्तु प्रतिशरीरं भिन्नो
विभुनित्यश्च ।
मनसः किं लक्षणं, कतिविधं च च तत् ?—
सुखाद्युपलब्धिसाधनमिन्द्रियं मनः । तच्च प्रत्यात्मनियतत्वा-
दनन्तं परमाणुरूपं नित्यं च ।
रूपस्य किं लक्षणं, कतिविधं च तत् ?—
चक्षुर्मात्रग्राह्यो गुणो रूपम् । तच्च शुक्लनीलपीतरक्तहरित-
पदकृत्यम्
सुखेति । आत्ममनःसंयोगादिवारणायेन्द्रियमिति । चक्षुरादिवारणाय
सुखेति ।
चक्षुरिति । १रूपत्वादिवारणाय गुणपदम् । रसादिवारणाय चक्षुर्ग्राह्य
इति । २संख्यादिवारणाय मात्रपदम् । यद्यपि प्रभाभित्तिसंयोगवारणाय
गुणपदेन विशेषगुणस्य विवक्षणीयतया तत एव संख्यादिवारणं संभवतीति
मात्रपदं व्यर्थम् । तथापि सांसिद्धिकद्रवत्ववारणाय तदावश्यकम् । वस्तुतस्तु
परमाणुरूपेऽव्याप्तिवारणाय चक्षुर्मात्रग्राह्यजातिमत्त्वस्य विवक्षणीयतया
विशेषपदं न देयम् । त्र्यणुकादिवारणाय गुणपदं तु देयम् । सप्तेति ।
रूपमित्यनुषज्यते ।
हिन्दी
१. जो पदार्थ जिस इन्द्रियसे ग्राह्य है, उसमें रहनेवाली जाति भी उसी इन्द्रियसे
ग्राह्य होती है—इस नियमके अनुसार रूपमें रहनेवाली रूपत्वजाति भी चक्षुर्मात्र-
ग्राह्य है। अतः रूपत्वमें रूपलक्षणकी अतिव्याप्ति न हो, इसके लिए गुणपद
दिया गया ।
२. एकत्वादि संख्या भी चक्षुद्वारा ग्राह्य गुण है, अतः उसमें रूपलक्षणकी
अतिव्याप्ति न हो, एतदर्थ मात्रपद दिया गया । अर्थात् संख्या चक्षुर्मात्र ग्राह्य नहीं है
क्योंकि त्वगिन्द्रिय द्वारा भी संख्याका ग्रहण होता है । अतः मात्रपद देनेसे लक्षणकी
अतिव्याप्ति नहीं हुई । यद्यपि प्रभा और भित्तिका संयोग भी चक्षुर्मात्र ग्राह्य गुण है,
अतः उसमें अतिव्याप्ति वारणके लिए गुणपदमे विशेषगुण विवक्षित करना होगा ।
ऐसी स्थितिमें उसीसे संख्यादिका भी वारण सुतरां हो जायगा । अतः मात्रपद देना
व्यर्थ है । तथापि सांसिद्धिकद्रवत्वरूपविशेषगुणका वारण करनेके लिए मात्रपद देना
आवश्यक है । वस्तुतः तो परमाणुरूपमें अव्याप्तिवारणके लिए चक्षुर्मात्रग्राह्यजाति
(रूपत्व) मत्व विवक्षित करना होगा । ऐसी स्थितिमें प्रभाभित्तिके संयोगमें उक्तजाति
(रूपत्व) मत्व नहीं होनेसे सुतरां अतिव्याप्ति नहीं होगी । अतः गुणमें विशेषपद देना तो