तर्कसंग्रह एवं न्यायबोधिनी (अन्नम्भट्ट - पं. केदारनाथ त्रिपाठी सान्वय सटीक)
Tarkasangraha with Nyayabodhini of Annambhatta by Kedarnath Tripathi
अन्नम्भट्ट द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसहिन्दीपदकृत्यसहितः १४१
कतिः गुणाः के च ते ? -
रूपरसगन्धस्पर्शसङ्ख्यापरिमाणपृथक्त्वसंयोगविभागपरत्वाप-
रत्वगुरुत्वद्रवत्वस्नेहशब्दबुद्धिसुखदुःखेच्छाद्वेषप्रयत्नधर्माधर्मसंस्का -
राश्चतुर्विंशतिगुणाः ।
कियन्ति कर्माणि कानि च तानि ?—
उत्क्षेपणापक्षेपणाकुञ्चनप्रसारणगमनानि पञ्च कर्माणि ।
सामान्यं कतिविधं ?—
परम्परं चेति द्विविधं सामान्यम् ।
पदकृत्यम्
परम्परं चेति । परसामान्यपरसामान्यमित्यर्थः । १परत्वं चाधिकदेश-
वृत्तित्वम् । अपरत्वं न्यूनदेशवृत्तित्वम् ।
२. तदेव हि लक्षणं यदव्याप्त्यतिव्याप्त्यसम्भावरूपदोषत्रयशन्यम्, यथा
गोः सास्नादिमत्त्वम् । अव्याप्तिश्च लक्ष्यैकदेशावृत्तित्वम्, अत एव गोर्न
कपिलत्वं लक्षणं, तस्याव्याप्तिग्रस्तत्वात् ! अतिव्याप्तिश्च लक्ष्यवृत्तित्वे
सत्यलक्ष्यवृत्तित्वम्, अत एव गोर्ण श्रृङ्गित्त्वं लक्षणं तस्यातिव्याप्तिग्रस्तत्वात् ।
हिन्दी
B. द्रव्यत्वजातिसे युक्त होना, गुणवान् होना या कार्यके प्रति समवायिकारण होना
ये द्रव्यके सामान्य लक्षण हैं ।
परसामान्य और अपरसामान्य ये दो प्रकारके सामान्य होते हैं ।
१. जो सामान्य किसीकी अपेक्षा अधिक देशमें रहे वह परसामान्य है और जो
किसीकी अपेक्षा न्यून देशमें रहे वह अपरसामान्य है । जैसे—पृथिवीत्वादि की अपेक्षा
द्रव्यत्व परसामान्य है तथा द्रव्यत्वकी अपेक्षा पृथिवीत्व आदि अपरसामान्य है ।
२. लक्षण वही होता है, जो अव्याप्ति, अतिव्याप्ति और असंभव रूप तीनों
दोषोंसे रहित हो । जैसे गोका “सास्नावत्त्व” लक्षण है । लक्षणका लक्ष्यके किसी
भागमें न रहना अव्याप्ति है । इसीलिये कपिलत्व गोका लक्षण नहीं है, क्योंकि श्वेत
गोमें नहीं रहनेसे वह अव्याप्तिदोषसे ग्रस्त है । लक्ष्यमें रहते हुए अलक्ष्यमें भी रहना
अतिव्याप्ति है । इसीलिये श्रृङ्गत्व गोका लक्षण नहीं है, क्योंकि महिषमें भी रहनेके
कारण श्रृङ्गत्वलक्षण अतिव्याप्तिदोषसे ग्रस्त है । लक्ष्यमात्रमें न रहना असंभवदोष
है । जैसे गोका एकशफवत्त्व ( एक खुर होना ) लक्षण नहीं है, क्योंकि किसी भी गोमें
एक खुर नहीं होनेसे वह लक्षण असंभवदोषग्रस्त है ।