तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Taittiriya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 178, कुल 261 में से
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मात्माकामयत बहु स्यामिति । स | कहा गया था—'आत्माने कामना की
यथाकामं चाकाशादिकार्यं सच्च- | कि मैं बहुत हो जाऊँ' । वह अपनी
दादिलक्षणं सृष्ट्वा तदनु प्रविश्य | कामनाके अनुसार सत् त्यत् आदि
पश्यञ्शृण्वन्मन्वानो विजानन् | लक्षणोंवाले आकाशादि कार्यवर्गको
बहुभवत्तस्मात्तदेवेदमाकाशादि- | रचकर उसमें अनुप्रविष्ट हो द्रष्टा,
कारणं कार्यस्थं परमे व्योमन् | श्रोता, मन्ता और विज्ञातारूपसे
हृदयगुहायां निहितं तत्प्रत्ययाव- | बहुत हो गया । अतः आकाशादि-
भासविशेषेणोपलभ्यमानमस्ति | के कारण, कार्यवर्गमें स्थित,
इत्येवं विजानीयादित्युक्तं भवति । | परमाकाशके भीतर बुद्धिरूप गुहामें
छिपे हुए और उसके कर्त्ता-भोक्तादि-
तदेतस्मिन्नर्थे ब्राह्मणोक्त एष | रूप जो प्रत्ययावभास हैं उनके द्वारा
श्लोको मन्त्रो भवति । यथा | विशेषरूपसे उपलब्ध होनेवाले उस
पूर्वेषु अन्नमयाद्यात्मप्रकाशकाः | ब्रह्मको ही 'वह है' इस प्रकार जाने-
पञ्चस्वप्येवं सर्वान्तरतमात्मास्ति- | ऐसा कहा गया ।
त्वप्रकाशकोऽपि मन्त्रः कार्य- | उस इस ब्राह्मणोक्त अर्थमें ही
द्वारेण भवति ॥ १ ॥ | यह श्लोक यानी मन्त्र है । जिस
प्रकार पूर्वोक्त पाँच पर्यायोंमें अन्नमय
आदि कोशोंके प्रकाशक श्लोक थे
उसी प्रकार सबकी अपेक्षा आन्तरतम
आत्माके अस्तित्वको उसके कार्यद्वारा
प्रकाशित करनेवाला भी यह मन्त्र
है ॥ १ ॥
इति ब्रह्मानन्दवल्ल्यां षष्ठोऽनुवाकः ॥ ६ ॥