तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Taittiriya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 175, कुल 261 में से
संदर्भ में पढ़ेंअनु० ६ ] शाङ्करभाष्यार्थ १६९
❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧
यथा चालोकविशिष्टा घटा- | जिस प्रकार कि प्रकाशयुक्त
द्युपलब्धिरेवं बुद्धिप्रत्ययालोक- | घटादिकी उपलब्धि होती है उसी
विशिष्टात्मोपलब्धिः स्यात्तस्मा- | प्रकार बुद्धिके प्रत्ययरूप प्रकाशसे
दुपलब्धिहेतौ गुहायां निहित- | युक्त आत्माका अनुभव होता है ।
मिति प्रकृतमेव । तद्वृत्तिस्थ्या- | अतः उपलब्धिकी हेतुभूत गुहामें
नीये त्विह पुनस्तत्सृष्ट्वा तदेवा- | वह निहित है—इसी बातका यह
नुप्राविशदित्युच्यते । | प्रसङ्ग है । उसकी वृत्ति (व्याख्या)
| के रूपमें ही श्रुतिद्वारा 'उसे रचकर
| वह पीछेसे उसीमें प्रवेश कर गया'
| ऐसा कहा गया है ।
तदेवेदमाकाशादिकारणं कार्यं | इस प्रकार इस कार्यवर्गको
सृष्ट्वा तदनुप्रविष्टमिवान्तर्गुहायां | रचकर इसमें अनुप्रविष्ट-सा हुआ
बुद्धौ द्रष्टृ श्रोतॄ मन्तृ विज्ञातृत्वेनेवं | आकाशादिका कारणरूप वह ब्रह्म
विशेषवदुपलभ्यते । स एव तस्य | ही बुद्धिरूप गुहामें द्रष्टा, श्रोता,
प्रवेशस्तस्मादस्ति तत्कारणं ब्रह्म । | मन्ता और विज्ञाता—ऐसा सविशेष-
| रूप-सा जान पड़ता है । यही
| उसका प्रवेश करना है । अतः
| वह ब्रह्म कारण है; इसलिये उसका
| अस्तित्व होनेके कारण उसे 'है'
अतोऽस्तित्वादस्तीत्येवोपलब्धव्यं | इस प्रकार ही ग्रहण करना चाहिये ।
तत् । |
तत्कार्यमनुप्रविश्य, किम् ? | उसने कार्यमें अनुप्रवेश करके
| फिर क्या किया ? वह सत्—मूर्त
तस्य सच्च मूर्तं त्यच्चामूर्त- | और असत्—अमूर्त हो गया । जिन-
सर्वात्म्यम् मभवत् । मूर्तामूर्ते | के नाम और रूपकी अभिव्यक्ति
ह्यव्याकृतनामरूपे आत्मस्थे | नहीं हुई है, वे मूर्त और अमूर्त तो
| आत्मामें ही रहते हैं । उन 'मूर्त'
अन्तर्गतैनात्मना व्याक्रियेते | एवं 'अमूर्त' शब्दवाच्य पदार्थोंको
| उनका अन्तर्वर्ती आत्मा केवल
व्याकृते मूर्तामूर्तशब्दवाच्ये । ते | अभिव्यक्त कर देता है । उनके
CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri