तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Taittiriya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 136, कुल 261 में से
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प्राणकी महिमा और मनोमय कोशका वर्णन
प्राणं देवा अनु प्राणन्ति । मनुष्याः पशवश्च ये ।
प्राणो हि भूतानामायुः । तस्मात्सर्वायुषमुच्यते । सर्वमेव
त आयुर्यन्ति ये प्राणं ब्रह्मोपासते । प्राणो हि भूता-
नामायुः । तस्मात्सर्वायुषमुच्यत इति । तस्यैष एव
शारीर आत्मा यः पूर्वस्य । तस्माद्वा एतस्मात्प्राणमयाद्-
न्योऽन्तर आत्मा मनोमयः । तेनैष पूर्णः । स वा
एष पुरुषविध एव । तस्य पुरुषविधतामन्वयं पुरुष-
विधः । तस्य यजुरेव शिरः । ऋग्दक्षिणः पक्षः । सामोत्तरः
पक्षः । आदेश आत्मा । अथर्वाङ्गिरसः पुच्छं प्रतिष्ठा ।
तदप्येष श्लोको भवति ॥ १ ॥
देवगण प्राणके अनुगामी होकर प्राणन-क्रिया करते हैं तथा जो
मनुष्य और पशु आदि हैं [ वे भी प्राणन-क्रियासे ही चेष्टावान् होते हैं ] ।
प्राण ही प्राणियोंकी आयु ( जीवन ) है । इसीलिये वह 'सर्वायुष'
कहलाता है । जो प्राणकी ब्रह्मरूपसे उपासना करते हैं वे पूर्ण आयुको
प्राप्त होते हैं । प्राण ही प्राणियोंकी आयु है । इसलिये वह 'सर्वायुष'
कहलाता है । उस पूर्वोक्त ( अन्नमय कोश ) का यही देहस्थित आत्मा
है । उस इस प्राणमय कोशसे दूसरा इसके भीतर रहनेवाला आत्मा
मनोमय है । उसके द्वारा यह पूर्ण है । वह यह [ मनोमय कोश ] भी
पुरुषाकार ही है । उस ( प्राणमय कोश ) की पुरुषाकारताके अनुसार ही यह
भी पुरुषाकार है । यजुः ही उसका शिर है, ऋक् दक्षिण पक्ष है,
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