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सर्वकोश
तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Taittiriya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished261 पृष्ठ

पृष्ठ 137, कुल 261 में से

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पृष्ठ 137

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अनु० ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ १३१


साम उत्तर पक्ष है, आदेश आत्मा है तथा अथर्वाङ्गिरस पुच्छ—
प्रतिष्ठा है । उसके विषयमें ही यह श्लोक है ॥ १ ॥


[बायाँ स्तम्भ - संस्कृत भाष्य]

प्राणं देवा अनु प्राणन्ति ।
[हाशिया: प्राणस्य प्राधान्यम्] देवा अग्न्यादयः प्राणं वाय्वात्मानं
प्राणनशक्तिमन्तमनु तदात्म-
भूताः सन्तः प्राणन्ति प्राणन-
कर्म कुर्वन्ति प्राणनक्रियया
क्रियावन्तो भवन्ति । अध्यात्मा-
धिकाराद्देवा इन्द्रियाणि प्राणमनु
प्राणन्ति मुख्यंप्राणमनु चेष्टन्त
इति वा । तथा मनुष्याः पशवश्च
ये ते प्राणनकर्मणैव चेष्टावन्तो
भवन्ति ।
अतश्च नान्नमयैनैव परिच्छि-
न्नेनात्मनात्मवन्तः प्राणिनः ।
किं तर्हि ? तदन्तर्गतेन प्राणमये-
नापि साधारणेनैव सर्वपिण्ड-
व्यापिनात्मवन्तो मनुष्यादयः ।
एवं मनोमयादिभिः पूर्वपूर्वव्या-
पिभिरुत्तरोत्तरैः सूक्ष्मैरानन्दम-
यान्तैराकाशादिभूतारब्धैरविद्या-
कृतैरात्मवन्तः सर्वे प्राणिनः ।
तथा स्वाभाविकेनाप्याकाशादि-


[दायाँ स्तम्भ - हिन्दी भाष्यार्थ]

प्राणं देवा अनु प्राणन्ति—अग्नि
आदि देवगण प्राणनशक्तिमान् वायु-
रूप प्राणके अनुगामी होकर अर्थात्
तद्रूप होकर प्राणन-क्रिया करते
हैं; यानी प्राणन-क्रियासे क्रियावान्
होते हैं । अथवा यहाँ अध्यात्म-
सम्बन्धी प्रकरण होनेसे [ यह
समझना चाहिये कि ] देव अर्थात्
इन्द्रियाँ प्राणके पीछे प्राणन करती
यानी मुख्य प्राणकी अनुगामिनी
होकर चेष्टा करती हैं । तथा जो
भी मनुष्य और पशु आदि हैं वे ही
प्राणन-क्रियासे ही चेष्टावान् होते हैं ।
इससे जाना जाता है कि प्राणी
केवल परिच्छिन्नरूप अन्नमय कोशसे
ही आत्मवान् नहीं हैं । तो क्या
है ? वे मनुष्यादि जीव उसके
अन्तर्वर्ती सम्पूर्ण पिण्डमें व्याप्त
साधारण प्राणमय कोशसे भी
आत्मवान् हैं । इस प्रकार पूर्व-पूर्व
कोशमें व्यापक मनोमयसे लेकर
आनन्दमय कोशपर्यन्त, आकाशादि
भूतोंसे होनेवाले अविद्याकृत कोशों-
से सम्पूर्ण प्राणी आत्मवान् हैं ।
इसी प्रकार वे स्वभावसे ही


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