तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Taittiriya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 127, कुल 261 में से
संदर्भ में पढ़ेंअनु० १ ] शाङ्करभाष्यार्थ १२१
[वाम भाग / Left Column - मूल पाठ]
जनकाकृतिनियमदर्शनात् ।
सर्वेषामप्यन्नरसविकारत्वे ब्र-
ह्मवंशयत्वे चाविशिष्टे कस्मात्पुरुष
एव गृह्यते ?
प्राधान्यात् ।
किं पुन: प्राधान्यम् ?
कर्मज्ञानाधिकार: । पुरुष एव
[कथं पुरुषस्य प्राधान्यम्] हि शक्तत्वाद-
र्थित्वादपर्युदस्त-
त्वाच्च कर्मज्ञानयोरधिक्रियते—
“पुरुषे त्वेवाविस्तरामात्मा स
हि प्रज्ञानेन संपन्नतमो विज्ञातं
वदति विज्ञातं पश्यति वेद
श्वस्तनं वेद लोकालोकौ मर्त्ये-
नामृतमीक्षतीत्येवं संपन्न: ।
अथेतरेषां पशूनामशनायापिपासे
एवाभिविज्ञानम् ।” इत्यादि-
श्रुत्यन्तरदर्शनात् ।
[दक्षिण भाग / Right Column - हिन्दी भाष्यार्थ]
समान आकृति होनेका नियम देखा
जाता है ।
शङ्का—सृष्टिमें सभी शरीर समान-
रूपसे अन्न और रसके विकार
तथा ब्रह्माके वंशमें उत्पन्न हुए हैं;
फिर यहाँ पुरुषको ही क्यों ग्रहण
किया गया है ?
समाधान—प्रधानताके कारण ।
शङ्का—उसकी प्रधानता क्या है ?
समाधान—कर्म और ज्ञानका
अधिकार ही उसकी प्रधानता है ।
[ कर्म और ज्ञानके साधनमें ]
समर्थ, [ उनके फलकी ] इच्छावाला
और उससे उदासीन न होनेके
कारण पुरुष ही कर्म और ज्ञानका
अधिकारी है । “पुरुषमें ही आत्माका
पूर्णतया आविर्भाव हुआ है; वही
प्रकृष्ट ज्ञानसे सबसे अधिक सम्पन्न
है । वह जानी-बूझी बात कहता है,
जाने-बूझे पदार्थोंको देखता है, वह
कल होनेवाली बात भी जान सकता
है, उसे उत्तम और अधम लोकोंका
ज्ञान है तथा वह कर्म-ज्ञानरूप
नश्वर साधनके द्वारा अमर पदकी
इच्छा करता है—इस प्रकार वह
विवेकसम्पन्न है । उसके सिवा
अन्य पशुओंको तो केवल भूख-
प्यासका ही विशेष ज्ञान होता है”
ऐसी एक दूसरी श्रुति देखनेसे भी
[ पुरुषकी प्रधानता सिद्ध होती है ] ।
CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri