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सर्वकोश
तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Taittiriya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished261 पृष्ठ

पृष्ठ 117, कुल 261 में से

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पृष्ठ 117

अनु० १] शाङ्करभाष्यार्थ १२१
न तत्कारणान्तरसव्यपेक्षम् । | ही है; उसे किसी अन्य कारणकी
नित्यस्वरूपत्वात् । सर्वभावानां च | अपेक्षा नहीं है; क्योंकि वह नित्य-
| स्वरूप है । तथा उस ब्रह्मसे सम्पूर्ण
तेनाविभक्तदेशकालत्वात् काला- | भावपदार्थोंके देश-काल अभिन्न हैं,
| और वह काल तथा आकाशादि-
काशादिकारणत्वाच्च निरतिशय- | का भी कारण एवं निरतिशय सूक्ष्म
सूक्ष्मत्वाच्च । न तस्यान्यदविज्ञेयं | है; अतः ऐसी कोई सूक्ष्म, व्यवहित
| (व्यवधानवाली), विप्रकृष्ट (दूर)
सूक्ष्मं व्यवहितं विप्रकृष्टं भूतं | तथा भूत, भविष्यत् या वर्तमान
भवद्भविष्यद्वास्ति । तस्मात्सर्वज्ञं | वस्तु नहीं है जो उसके द्वारा जानी
| न जाती हो; इसलिये वह ब्रह्म
तद्ब्रह्म । | सर्वज्ञ है ।
मन्त्रवर्णाच्च—“अपाणिपादो | “वह बिना हाथ-पाँवके ही वेगसे
| चलने और ग्रहण करनेवाला है, बिना
जवनो ग्रहीता पश्यत्यचक्षुः स | नेत्रके ही देखता है और बिना
शृणोत्यकर्णः । स वेत्ति वेद्यं न | कानके ही सुनता है। वह सम्पूर्ण वेद्य-
च तस्यास्ति वेत्ता तमाहुरग्र्यं | मात्रको जानता है, उसे जाननेवाला
| और कोई नहीं है, उसे सर्वप्रथम परम-
पुरुषं महान्तम्” (श्वे० उ० ३ । | पुरुष कहा गया है।” इस मन्त्रवर्ण-
१९) इति । “न हि विज्ञातुर्वि- | से तथा “अविनाशी होनेके कारण
ज्ञातेर्विपरिलोपो विद्यतेऽविना- | विज्ञाताके ज्ञानका कभी लोप नहीं
| होता और उससे भिन्न कोई दूसरा
शित्वान्न तु तद्द्वितीयमस्ति” | भी नहीं है [जो उसे देखे]”
(बृ० उ० ४ । ३ । ३०) इत्यादि | इत्यादि श्रुतियोंसे भी यही सिद्ध
श्रुतेश्च । विज्ञातृस्वरूपाव्यतिरेका- | होता है । अपने विज्ञातृस्वरूपसे
| अभिन्न तथा इन्द्रियादि साधनोंकी
त्करणादिनिमित्तानपेक्षत्वाच्च ब्र- | अपेक्षासे रहित होनेके कारण ज्ञान-
ह्मणो ज्ञानस्वरूपत्वेऽपि नित्यत्व- | स्वरूप होनेपर भी ब्रह्मका नित्यत्व