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सर्वकोश
तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Taittiriya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished261 पृष्ठ

पृष्ठ 116, कुल 261 में से

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पृष्ठ 116

११० तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २

धात्वर्थोऽतोऽस्यानित्यत्वं पर- । हुआ करते हैं । ज्ञान भी धातुका
। अर्थ है; अतः इसकी भी अनित्यता
तन्त्रता च । । और परतन्त्रता सिद्ध होती है ।
।
न, स्वरूपाव्यतिरेकेण कार्य- । समाधान—ऐसी बात नहीं है;
। क्योंकि ज्ञान ब्रह्मके स्वरूपसे अभिन्न
[तन्निरासनम्] त्वोपचारात् । आ- । है, इस कारण उसका कार्यत्व केवल
त्मनः स्वरूपं ज्ञप्तिर्न । उपचारसे है । आत्माका स्वरूप जो
। 'ज्ञप्ति' है वह उससे व्यतिरिक्त
ततो व्यतिरिच्यतेऽतो नित्यैव । । नहीं है । अतः वह ( ज्ञप्ति ) नित्या
तथापि बुद्धेरुपाधिलक्षणायाश्च- । ही है । तथापि चक्षु आदिके द्वारा
। विषयरूपमें परिणत होनेवाली
क्षुरादिद्वारैर्विषयाकारेण परिणा- । उपाधिरूप बुद्धिकी जो शब्दादिरूप
मिन्या ये शब्दाद्याकारावभासाः । प्रतीतियाँ हैं वे आत्मविज्ञानकी
। विषयभूत होकर उत्पन्न होती हुई
त आत्मविज्ञानस्य विषयभूता । आत्मविज्ञानसे व्याप्त ही उत्पन्न
उत्पद्यमाना एवात्मविज्ञानेन । होती हैं [ अर्थात् अपनी उत्पत्तिके
। समय उन प्रतीतियोँमें तो आत्म-
व्याप्ता उत्पद्यन्ते । तस्मादात्म- । विज्ञानसे प्रकाशित होनेकी योग्यता
विज्ञानावभासाश्च ते विज्ञान- । रहती है और आत्मविज्ञान उन्हें
। प्रकाशित करता रहता है ] ।
शब्दवाच्याश्च धात्वर्थभूता । अतः वे धातुओंकी अर्थभूत
आत्मन एव धर्मा विक्रियारूपा । एवं 'विज्ञान' शब्दवाच्य आत्म-
। विज्ञानकी प्रतीतियाँ आत्माका ही
इत्यविवेकिभिः परिकल्प्यन्ते । । विकाररूप धर्म हैं—ऐसी अविवेकियों-
। द्वारा कल्पना की जाती है ।
यत्तु यद्ब्रह्मणो विज्ञानं तत् । किन्तु उस ब्रह्मका जो विज्ञान
सवितृप्रकाशवदग्न्युष्णवच्च ब्रह्म- । है वह सूर्यके प्रकाश तथा अग्निकी
। उष्णताके समान ब्रह्मके स्वरूपसे
स्वरूपाव्यतिरिक्तं स्वरूपमेव तत्; । भिन्न नहीं है, बल्कि उसका स्वरूप

CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri