तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Taittiriya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 115, कुल 261 में से
संदर्भ में पढ़ेंअनु० १ ]
शाङ्करभाष्यार्थ
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[मूल संस्कृत (वाम स्तम्भ)]
रात्मैव ब्रह्म । "एतमानन्दमयमा-
त्मानमुपसंक्रामति" ( तै० उ०
२।८।५) इति चात्मतां दर्शयति।
तत्प्रवेशाच्च; "तत्सृष्ट्वा तदेवानु-
प्राविशत्" (तै० उ० २ । ६ । १)
इति च तस्यैव जीवरूपेण शरीर-
प्रवेशं दर्शयति । अतो वेदितुः
स्वरूपं ब्रह्म ।
एवं तस्यात्मत्वाज्ज्ञानकर्तृ-
त्वम् । आत्मा ज्ञातेति हि
प्रसिद्धम् । "सोऽकामयत" ( तै०
उ० २।६।१) इति च कामिनो
ज्ञानकर्तृत्वाज्ज्ञप्तिर्ब्रह्मेत्ययुक्तम् ।
अनित्यत्वप्रसङ्गाच्च । यदि
नाम ज्ञप्तिर्ज्ञानमिति भावरूपता
ब्रह्मणस्तथाप्यनित्यत्वं प्रसज्येत
पारतन्त्र्यं च । धात्वर्थानां
कारकापेक्षत्वात् । ज्ञानं च
[हिन्दी भाष्यार्थ (दक्षिण स्तम्भ)]
किया जानेके कारण ब्रह्म
जाननेवालेका आत्मा ही है । "इस
आनन्दमय आत्माको प्राप्त हो जाता
है" इस वाक्यसे श्रुति उसकी
आत्मता दिखलाती है तथा उसके
प्रवेश करनेसे भी [उसका आत्मत्व
सिद्ध होता है ] । "उसे रचकर वह
उसीमें प्रविष्ट हो गया" ऐसा कहकर
श्रुति उसीका जीवरूपसे शरीरमें
प्रवेश होना दिखलाती है । अतः
ब्रह्म जाननेवालेका स्वरूप ही है ।
इस प्रकार आत्मा होनेसे तो
उसे ज्ञानका कर्तृत्व सिद्ध होता है ।
'आत्मा ज्ञाता है' यह बात तो
प्रसिद्ध ही है। "उसने कामना की"
इस श्रुतिसे कामना करनेवालेके
ज्ञानकर्तृत्वकी सिद्धि होती है । अतः
ब्रह्मका ज्ञानकर्तृत्व निश्चित होनेके
कारण 'ब्रह्म ज्ञप्तिमात्र है' ऐसा कहना
अनुचित है ।
इसके सिवा ऐसा माननेसे
अनित्यत्वका प्रसङ्ग भी उपस्थित
होता है । यदि 'ज्ञान ज्ञप्तिको कहते
हैं' इस व्युत्पत्तिके अनुसार ब्रह्मकी
भावरूपता मानी जाय तो भी
उसके अनित्यत्व और पारतन्त्र्यका
प्रसङ्ग उपस्थित हो जाता है; क्योंकि
धातुओंके अर्थ कारकोंकी अपेक्षावाले