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सर्वकोश
तैत्तिरीय आरण्यक (सायण भाष्य एवं भट्टभास्कर भाष्य सहित सम्पूर्ण प्रथम भाग)

तैत्तिरीय आरण्यक (सायण भाष्य एवं भट्टभास्कर भाष्य सहित सम्पूर्ण प्रथम भाग)

Taittiriya Aranyaka with Sayanacharya Commentary

कृष्ण यजुर्वेदीय महर्षि मण्डल (भाष्यकार: श्रीमत् सायणाचार्य) द्वारा

DevanagariSanskritpublished914 पृष्ठ

पृष्ठ 250, कुल 914 में से

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पृष्ठ 250

?
Wait, look at the letters after अभि:
"ष्टु" or "हु" or "द्रु"?
"होत्रे घर्ममभिष्टुहीति"!!
YES! "अभिष्टुहीति"!
अ-भि-ष्टु-ही-ति!
"होत्रे घर्ममभिष्टुहीति"!!
Look at the ligature: ष्ट + ु = ष्टु!
And before घर्म:
Is it "होत्र" or "होत्रे"?
It is "होत्रे घर्ममभिष्टुहीति"!
Wait, is there a repha: "होत्रेर्घर्ममभिष्टुहीति"?
Look above "त्रे": there is an 'े' and no repha?
Wait, look above 'घ': there is a repha: "घर्म".
Wait, between 'त्रे' and 'घ':
"होत्रे घर्ममभिष्टुहीति"
Let's check the letters:
हो त् र े घ र् म म भ ि ष्टु ह ी त ि
Yes! "होत्रे घर्ममभिष्टुहीति"!
Then:
"प्रैषस्योक्तत्वाद्धोतृकृत्यमनुवचनं विधत्ते—"
प्रैषस्योक्तत्वात् + होतृकृत्यम् + अनुवचनं = प्रैषस्योक्तत्वाद्धोतृकृत्यमनुवचनं विधत्ते—
Perfect!

होता