स्वदेशी और भारतीयता (धरमपाल एवं राजीव दीक्षित - स्वावलम्बी अर्थनीति एवं ग्राम-स्वराज्य दर्शन)
Swadeshi Aur Bhartiyata: Swavalambi Arthniti evam Gram Swarajya Darshan
धरमपाल एवं राजीव दीक्षित विचार पीठ द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंआदि में क्या खाएँ क्या न खाएँ, पूजा-अर्चना में किन वस्तुओं का, किस तरह के
पेड़ों-पत्तियों और फूलों का प्रयोग करें, किनका न करें, विवाह आदि में कैसी
व्यवस्था तथा व्यवहार करें, इन सबका विचार करते समय हमारे जो संस्कार
उभर आते हैं और व्यवहार में व्यक्त होते हैं, वे हमारे भीतर भारतीयता के
संस्कारों की गहराई के सूचक हैं। भोजन, वस्त्र, औषधि आदि में ऐसे भारतीय
संस्कार अभी पचास वर्ष पूर्व तक व्यापक और प्रबल दिखते थे। आज वे बहुत
कम हो चले हैं। तो इससे शायद यह निष्कर्ष भी निकल सकता है कि सुव्यवस्थित
प्रयास से वे संस्कार फिर से प्रबल बनाए जा सकते हैं।
भारतीयता पर अधिक कुछ कहने का अधिकारी तो मैं नहीं हूँ किन्तु
ऐसा स्पष्ट दिखता है कि भारतवर्ष में तथा उससे जुड़े उत्तरी, पूर्वी और
दक्षिण-पूर्वी एशियाई देशों में कुछ विशेष लक्षण और प्रवृत्तियाँ हैं। उन्हें हम
भारतीयता के रूप में पहचान सकते हैं। पश्चिम से उनका स्पष्ट भेद भी हम
भलीभांति देख सकते हैं। पश्चिम से मेरा आशय यूरोप, रूस और अमरीकी
महाद्वीप तथा अरब क्षेत्रों से है।
भातीयता के तथा भारत से जुड़े क्षेत्रों के मुख्य लक्षण समान हैं। एक
तो चराचर की पवित्रता का सिद्धांत है। सत्य और ऋत का अंग है। इसमें यह
दृष्टि है कि जीवमात्र पवित्र है और आदर-योग्य है। इनमें व्यावहारिक स्तर
पर कुछ घट-बढ़ या तारतम्य तो रहता है। पर जीवन का कोई भी रूप, जीवन
के दूसरे रूपों से इस अर्थ में श्रेष्ठ नहीं है कि एक रूप की रक्षा के लिए दूसरे
रूपों को समाप्त कर दिया जाय या पूर्ण अधीनता की दशा में ले आया जाय।
इसके साथ ही हमारे यहाँ जीवन को केवल मनुष्य में या कि कुछ
प्राणियों में ही सीमित कर के नहीं देखा गया। बल्कि उसे सर्वत्र देखा गया है।
समग्र सत्ता ही जीवन है। नदी-पर्वत, सागर, वृक्ष-वनस्पति सभी समग्र सत्ता के
महत्वपूर्ण अंग हैं। मनुष्य की अपनी सत्ता इसी समग्र सत्ता का अभिन्न अंश है।
मनुष्य अन्य जीव-सत्ताओं से कुछ नितान्त भिन्न या विरोधी या श्रेष्ठतम जीव
नहीं है।
मनुष्य की श्रेष्ठता का जहाँ कहीं महाभारत आदि में बखान है भी, तो
वह इसी अर्थ में कि मनुष्य को इस समग्र सत्ता का सम्मान करना है, इसके प्रति
अपना कर्तव्य निभाना है, उनका संरक्षण नहीं बल्कि उनके प्रति अपने कर्तव्य
का निर्वाह, उनसे मनुष्य जो लेता है उसे लौटाना, ऋण-शोधन करना है। यह
कहीं नहीं कहा गया है कि मनुष्य श्रेष्ठ है, इसलिए शेष सब उसके भोग साधन
हैं और वह उन सबके चाहे जैसे उपयोग का अधिकारी है। मनुष्य का गौरव
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सबके प्रति मैत्री, प्रेम तथा करूणा की अभिव्यक्ति और अनुभूति में ही है। हमारी
चाक्रवर्त्य की धारणा तक में दूसरों के समक्ष वीरता के प्रदर्शन का भाव ही प्रधान
है। उनके गौरव को समाप्त करने का नहीं। दूसरों के अपने संस्कृति-रूपों को
समाप्त करना तो चाक्रवर्त्य में भी निहित नहीं है। हमारी जीवन दृष्टि और
हमारी सामाजिक सांस्कृतिक-राजनैतिक संस्थायें, सभी का मुख्य आधार
परस्परता, स्वभाव में प्रतिष्ठित स्वधर्म, स्वाधीनता तथा अभय रहा है। इसलिए
हमारे यहाँ पूरे सामाजिक संगठन में ऐसी ही व्यवस्थायें थीं।
भारत में भूमि हो, जल हो, या वन, उस पर वहाँ के निवासियों का ही
स्वामित्व रहा है। वनों पर वन के जानवरों, घूमन्तू जातियों तथा वनवासियों का
अधिकार भारत में परंपरा से मान्य रहा है। हमारे सामाजिक संगठन में यह
व्यवस्था रही कि एक कुल-समूह या जाति समूह के एक ही तरह के प्राकृतिक
साधन स्रोतों से विशेष सम्बन्ध रहे। किसी का भूमि से विशेषकर, किसी का
पशुओं से, किसी का पक्षियों से, किसी का वनों से, किसी का जल से। फिर
इनमें भी व्यवस्थित वर्गीकरण रहे। व्यापक सामाजिक विधि निषेध थे, जो
सर्वमान्य थे। हर समूह की सामाजिक उपभोग की मर्यादायें निश्चित थीं। वनों
के बारे में भी यह बात लागू होती है। चराई का समय, शिकार का समय,
वनस्पतियों, जड़ी-बूटियों को तोड़ने या प्राप्त करने का समय सदा प्राकृतिक
व्यवस्था, ऋतु-चक्र और प्रकृति के अपने नियमों की समझ द्वारा निर्धारित
मर्यादायें थीं। पवित्र माने जाने वाले पेड़ों और प्राणियों का शिकार भी निषिद्ध
था। उनके जलाशय पवित्र घोषित होते थे उनमें न शिकार संभव था, न ही
उनका कोई निजी उपयोग। हर गांव के पास अपना सार्वजनिक चारागाह और
अपना सामुदायिक वन-क्षेत्र या वृक्ष-क्षेत्र होता था। इन सामाजिक विधि
निषेधों का उल्लंघन राज्य-तंत्र के लिए असंभव था। ऐसा राज्य तंत्र अधममय
मानकर बहिष्कृत और समाप्त कर दिया जाता था। मर्यादा का महत्व और
व्यापक धर्म से अनुशासित स्वधर्म की प्रतिष्ठा भारतीय जीवन दृष्टि का केन्द्रीय
भाव है। राजधर्म लोकधर्म का एक अंग है। लोक और लोकधर्म व्यापक है।
राज्य लोक से अनुशासित होता है। मनुष्य समेत सभी जीव सत्तायें लोक से ही
अनुशासित रहती हैं। लोक का अर्थ मानव समाज मात्र नहीं है। वस्तुतः
"मैनकाइंड के अर्थ में मानव समाज भारतीय जीवन दृष्टि की कभी धारणा ही
नहीं रहा। क्योंकि प्रत्येक मानव समूह अपने जनपद और अपने परिवेश का ही
सहज तथा अभिन्न अंग है। इसलिए किसी भी जनपद के मनुष्य का उस जनपद
के अन्य जीवों, पशु-पक्षियों, जलचर-थलचर-नभचर सभी जीव जन्तुओं,
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