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सर्वकोश
स्वदेशी और भारतीयता (धरमपाल एवं राजीव दीक्षित - स्वावलम्बी अर्थनीति एवं ग्राम-स्वराज्य दर्शन)

स्वदेशी और भारतीयता (धरमपाल एवं राजीव दीक्षित - स्वावलम्बी अर्थनीति एवं ग्राम-स्वराज्य दर्शन)

Swadeshi Aur Bhartiyata: Swavalambi Arthniti evam Gram Swarajya Darshan

धरमपाल एवं राजीव दीक्षित विचार पीठ द्वारा

DevanagariHindipublished50 पृष्ठ

पृष्ठ 10, कुल 50 में से

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वृक्ष-वनस्पतियों, आकाश, नदी-पर्वत, तालाब-झरने, कुएं-बावड़ी, फल-फूल,
अनाज आदि से अधिक घनिष्ठ संबंध और आत्मीयता है, बनिस्पत बहुत दूरवर्ती
किसी अन्य मानव समूह से। इस प्रकार मध्य देश के निवासी मनुष्यों के सहज
आत्मीय तो मध्य देश के ही जीव-जंतु तथा चराचर जगत हैं न कि संयुक्त राज्य
अमरीका या और किसी अतिदूरवर्ती देश के मनुष्य। कुछ अंश तक तो यह
रिश्ता आज के संसार के दूसरे देशों में भी व्यावहारिक रूप में चलता ही है।
चराचर जीवों और जीवन से आत्मीयता के ये संस्कार अभी भी व्यवहार में
प्रकट होते हैं। चीटियों, कौवों, कुत्तों के लिए अंश निकालने, बंदरों को चने आदि
खिलाने, गायों की सेवा करने, सांड़ आदि को मुक्त छोड़ने, मछलियों को खिलाने,
नदियों के प्रति आदर और श्रद्धा का भाव, तालाब, कुएं, बावड़ियां बनवाने को
पुण्य कर्म मानना, चिड़ियों तथा विविध पक्षियों को चुगने के लिए दाने डालना;
शेर, मगर जैसे भयंकर माने जाने वाले जीवों के लिए भी गहरी आत्मीयता तथा
परस्परता का भाव रखना और उनसे किसी अतिरंजित भय को न पालना, सांप
को दूध पिलाना, शादी-विवाह में नदियों-बावड़ियों-कुओं आदि को पूजना
और न्यौतना- ये सब इसी भारतीय जीवन दृष्टि के अभिन्न अवयव हैं।
इस भारतीयता में मनुष्य कोई सृष्टि का केन्द्र नहीं है। सहज अंश है।
समस्त जीवन-रूप पूज्य है, पवित्र है और जीवन रूपों की विविधता सहज है,
रक्षणीय है तथा सम्मान योग्य है। मानवीय स्वभाव का वैविध्य जीवों की ही
तरह सहज और अनिवार्य है। जनपदों और कुलों के आधार पर मनुष्यों की
सामाजिक पहचान ही स्वाभाविक है और अपने परिवेश से अभिन्नता की अनुभूति
भी उतनी ही स्वाभाविक है। इसी कारण हमारे यहाँ ऐसी कोई परंपरा कभी
नहीं रही कि समस्त मनुष्य किसी एक मानव-जाति के केन्द्रीय संगठन से
अनुशासित और संचालित होने योग्य हैं, और मानव का संगठन हमारे यहाँ इस
दृष्टि से तो कभी सोचा ही नहीं गया कि प्रकृति और प्राणिमात्र उसके शत्रु हैं
और उनसे उसे अपनी रक्षा करनी है।
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इसके विपरीत यूरोप की, ईसाईयत की विश्वदृष्टि में मनुष्य ही केन्द्रीय
सत्ता है। इस्लाम की दृष्टि भी ऐसी ही है। वही समस्त सृष्टि का केन्द्र है। यह
सम्पूर्ण जगत, जीव-जन्तु और वृक्ष वनस्पतियाँ उसी के भोग के लिये और उसी
की सेवा में हैं। और मनुष्य सम्पूर्ण प्रकृति का तथा समस्त जीवों का स्वामी और
नियन्त्रक है तथा वह नियन्त्रक बने, यही वहाँ स्वाभाविक माना गया है। यूरोपीय
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सम्पर्क जब विश्व के भिन्न-भिन्न देशों से बढ़ा और जब वह धीरे-धीरे प्रकृति का
स्वामी स्वयं को मानने लगा, तब से ही आधुनिक पश्चिमी मनुष्य ने मानव जाति
की धारणा रची है। मानव जाति की यह धारणा मनुष्य को प्रकृति के विरूद्ध
तथा अन्य सभी जीवों के विरूद्ध रखकर देखती है। इस धारणा को मान लेने के
बाद यही स्वाभाविक है कि भिन्न-भिन्न कसौटियों के आधार पर मानव-जाति
की विविध श्रेणियाँ बनाई जायें और इस श्रेणी-क्रम में जो लोग ऊँचे सोपान पर
हैं, उन्हें शेष सबके जीवन को नियन्त्रित करने का स्वाभाविक अधिकार मान्य
किया जाये। इसे ही साकार करने के लिये दर्शन, साहित्य, विज्ञान और
प्रौद्योगिकी की ऐसी दिशाएँ और ऐसे संस्थान विकसित किये गये और उन्हें
ऐसी दिशाओं में नियोजित किया गया तथा उनकी ऐसी व्याख्याएँ की गई,
जिससे कि इस मानव-केन्द्रित दृष्टि की निर्विवाद प्रतिष्ठा हो और अन्ततः
विकसित उच्च श्रेणी के यूरोपीय या पश्चिमी मनुष्य के लक्ष्यों की रक्षा और
पोषण हो सके।
यूरोपीय सफलता के चकाचौंध के कारण भारतीय शासक-समूहों,
भारतीय राज्य की सेवा के इच्छुक प्रतिस्पर्धी समूहों तथा सम्पन्न लोगों में भी
यूरोपीय मानव-केन्द्रित मान्यताएँ आज एक सीमा तक पैठ चुकी हैं। हम इस
रास्ते पर कहाँ तक, कितना और कैसे चल पायेंगे, यह पूरी तरह सोचने समझने
का समय निकाले बिना ये मान्यताएँ अपना ली गई हैं। इसी के प्रभाव से भय की
और दूसरे को शत्रुभाव से देखने की मनोवृत्तियाँ भी इन समूहों में बढ़ती जा रही
हैं। हमारा पुलिस बल भी समाज को भयभीत रखकर ही व्यवस्था की रक्षा कर
पाना सम्भव समझने लगा है। इसलिए अपने संस्कारों के कारण वह अपने
समाज का प्रत्यक्ष दमन-उत्पीड़न शायद उतना अधिक नहीं भी कर पाता हो,
परन्तु उसके किस्से हवा में फैलें और समाज के सर्वसाधारण लोग उससे
आतंकित/भयभीत रहें, उसका यह प्रयास प्रायः दिखता है। राज्य-संस्था की
दंड-शक्ति का लक्ष्य केवल दुष्टता को त्रास देना होता है जिससे समाज में
स्वधर्म-पालन के लिए अभय और आत्मीयता का परिवेश सुदृढ़ बने। समाज में
भय का संचार करने वाला या उसमें फूट और भेद-भाव बढ़ाने वाला राज्य तो
हमारे यहाँ कुराज ही कहा गया है। आततायी राज्य को तो समाज आत्मीय
भाव से देख नहीं पायेगा। इसलिए भारतीय राज्य के सेवकों तथा सेवा के
इच्छुक प्रतिस्पर्धियों को भी राज्य और समाज के रिश्तों में परस्पर भय, अलगाव,
अविश्वास तथा विरोध भाव को बढ़ावा देना त्यागना चाहिए।
हमें कौन सी दिशा अपनानी है, यह निश्चय तो हमें ही करना पड़ेगा।
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स्व भा -3