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स्वदेशी और भारतीयता (धरमपाल एवं राजीव दीक्षित - स्वावलम्बी अर्थनीति एवं ग्राम-स्वराज्य दर्शन)

स्वदेशी और भारतीयता (धरमपाल एवं राजीव दीक्षित - स्वावलम्बी अर्थनीति एवं ग्राम-स्वराज्य दर्शन)

Swadeshi Aur Bhartiyata: Swavalambi Arthniti evam Gram Swarajya Darshan

धरमपाल एवं राजीव दीक्षित विचार पीठ द्वारा

DevanagariHindipublished50 पृष्ठ

पृष्ठ 8, कुल 50 में से

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पृष्ठ 8

जीवन में प्रतिष्ठा की चीजें नहीं रहे और उनका धीरे-धीरे लोप ही हो चला है।
1920 से चली खादी भी अब कम ही हो रही है। उसके लिए कपास मिलना ही
कठिन हो गया है। वैसे ही जैसे कि पिछले 100--150 वर्षों में लोहा बनाने वालों
के लिए लोहा बनाने के पत्थर (आग जलाने वाला कोयला) का मिलना असम्भव
कर दिया गया था। गौ-वंश के प्रति श्रद्धा भाव तो अब भी है, परन्तु गौ-वंश
निरंतर घट रहा है और उस पर हमारे सभ्य समाज में कोई बेचैनी या चिन्ता
नहीं दिखाई पड़ती। हमारे भोजन की सामग्री भी आज अधिकतर तो गैर भारतीय
विज्ञान, प्रौद्योगिकी और उत्पादन प्रक्रिया के द्वारा ही तैयार की जाती है। यहाँ
तक कि छाछ तक खाते-पीते घरों में भी दुर्लभ हो चली है।
तब ऐसी स्थिति में स्वदेशी की भावना का प्रसार किन शक्तियों के बल
पर होगा, यह प्रश्न स्वाभाविक है। यह विचार भी अपेक्षित है कि क्या स्वदेशी में
यह ह्रास अथवा स्वदेशी की यह उपेक्षा अंग्रेजी काल से शुरू हुई या पहले से?
दिखता तो यह है कि अंग्रेजों से पराजय से पहले से भी हमारे शासक
समूहों और सम्पन्न जनों में स्वदेशी का महत्त्व स्थान-स्थान पर घटने लगा था।
दिल्ली और बहमनी के इस्लामी शासकों के आधिपत्य वाले भारतीय क्षेत्रों के
असर से सन् 1600 के आसपास, मराठा शासकों और मराठा कुलीनतंत्र में
फारसी भाषा और वेशभूषा तथा तौर-तरीकों का प्रभाव छा गया - सा दिखता
है। परन्तु फिर शिवाजी के समय मराठा क्षेत्र में स्वदेशी का उभार आ गया था,
ऐसा कहा जाता है। उस समय वहाँ फारसी मुहावरों आदि का प्रयोग भी घटा।
लगता है कि 1550 से 1750 के बीच देश के विभिन्न हिस्सों में भी इसी तरह
स्वदेशी में गिराव व उभार आता रहा।
1800 तक हम ब्रिटेन से हार चुके थे और ब्रिटेन का कब्जा पूरे भारत
पर होता चला गया। इस हार से ब्रिटेन और युरोप के प्रति अधीनता का भाव भी
बढ़ा। 1830 में ब्रिटिश गवर्नर जनरल बेंटिक इस पर संतोष व्यक्त करते हुए
कहते हैं कि "सम्पन्न और प्रतिष्ठित भारतीय अब पश्चिमी शिष्टाचार तथा
व्यवहार की विधियाँ अपनाने लगे हैं और भिक्षुकों, संन्यासियों और ब्राह्मणों
को दान देना छोड़ रहे हैं। अब उसकी जगह वह धन यूरोपियों का
आडम्बरपूर्ण ढंग से मनोरंजन करने में लगाया जाने लगा है।"
संभवतः बेंटिक का निरीक्षण ठीक ही था। संपन्न भारतीय जन तब
तक स्वदेशी तौर-तरीके छोड़ने लगे थे। यह सब क्रमशः बढ़ता गया।
उदाहरण के लिये कुछ वर्ष पहले मैं हरिद्वार के किसी पंडे की पुरानी
बही पलट रहा था। मैंने देखा कि उसमें अच्छी सुस्पष्ट अंग्रेजी में चार-पाँच
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पंक्तियाँ लिखी हैं और 1895 की वह प्रविष्टि मेरे ही कस्बे के किसी निवासी की
थी। बाकी बही हिन्दी में थी।
1891 से 1931 के बीच के, भारतीय जनगणना के अंग्रेजों द्वारा तैयार
आँकड़े उपलब्ध हैं। उनमें शिक्षा के बारे में चार मुख्य श्रेणियाँ हैं :-

  1. कुल निरक्षर, 2) कुल साक्षर, 3) देसी भाषा में साक्षर और 4) अंग्रेजी में
    साक्षर। जनगणना के ये आँकड़े दिखाते हैं कि तब भारत के बहुत से नगरों व
    क्षेत्रों में देसी भाषाओं में साक्षरता का जो प्रतिशत है, वह अंग्रेजी में साक्षरता के
    प्रतिशत से केवल चार गुना है। बाकी क्षेत्रों में यह प्रतिशत आठ गुना के लगभग
    है। यह तो होगा कि देसी भाषाओं में किसी को साक्षर, इन जनगणनाओं में, तभी
    लिखा गया हो, जब वह स्कूली प्रमाण-पत्र दिखाए, इसीलिए शायद देसी
    भाषाओं में साक्षरता का प्रतिशत अंग्रेजी साक्षरता से केवल चौगुना या आठ गुना
    दिखता है। भारतीय भाषाओं की पढ़ाई में कमी का मुख्य कारण पूरे देश में
    चलाई जा रही ब्रिटिश नीति ही होगी।
    प्रत्येक भाषा एक विशद अर्थ-परम्परा, दर्शन-परम्परा और विचार
    परम्परा की अभिव्यक्ति होती है। जब हम विदेशी भाषा को अपनाते हैं तो प्रायः
    स्वयं को और विश्व को, व्यक्ति, समाज, संस्थाओं, मान्यताओं तथा लक्ष्यों,
    रुचियों, आदर्शों आदि को भी हम उसी भाषा-परंपरा और संस्कृति - परंपरा
    से देखने लगते हैं।
    इसलिए न केवल उत्पादन और वस्तु निर्माण के क्षेत्र में स्वदेशी का
    ह्रास हमारे यहाँ हुआ है वरन् दर्शन, समाज चिंतन, विधि-विधान, राजनीतिशास्त्र,
    आत्मचिंतन, शिक्षा, आर्थिक-चिन्तन आदि सभी क्षेत्रों में हम यूरोपीय बुद्धि से
    शासित हो चले हैं। हमारी जो आत्मछवि है, वह भी यूरोपीय 'इंडोलॉजी" के
    विद्वानों द्वारा गढ़ी गई छवि है, जो उन्होंने अपने ही प्रयोजन से रची थी। हमारे
    जैसे पढ़े-लिखे आज अपने स्वभाव, धर्म, धर्मशास्त्र, शिल्पशास्त्र आदि को भी
    यूरोप द्वारा सिखाई गई आत्मछवि के माध्यम से ही देखने लगे हैं।
    चार
    तो क्या स्वदेशी के संस्कार बचे ही नहीं हैं? ऐसा नहीं है। निजी
    जीवन में और अपनों के प्रति व्यवहार में हमारे साधारण जन की स्वदेशी भावना
    झलकती है। संभवतः इसे ही भारतीयता कहा जा सकता है।
    भारतीयता हमारे निजी जीवन-व्यवहार और हमारी धार्मिक
    व्यवस्थाओं में अभी भी, चाहे कुछ प्राणहीन रूप में ही सही, जीवित है। व्रत-उपवास
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