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स्वदेशी और भारतीयता (धरमपाल एवं राजीव दीक्षित - स्वावलम्बी अर्थनीति एवं ग्राम-स्वराज्य दर्शन)

स्वदेशी और भारतीयता (धरमपाल एवं राजीव दीक्षित - स्वावलम्बी अर्थनीति एवं ग्राम-स्वराज्य दर्शन)

Swadeshi Aur Bhartiyata: Swavalambi Arthniti evam Gram Swarajya Darshan

धरमपाल एवं राजीव दीक्षित विचार पीठ द्वारा

DevanagariHindipublished50 पृष्ठ

पृष्ठ 4, कुल 50 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 4

दो शब्द
प्रस्तुत पुस्तक धर्मपालजी द्वारा समय समय पर लिखे गये लेखों का
संकलन है। व्यापक संदर्भों में भारतीयता एवं स्वदेशी की समझ बनाने में यह
पुस्तक अत्यंत उपयोगी सिद्ध होगी। साथ ही साथ यह पश्चिमी सभ्यता के
वास्तविक स्वरूप एवं उसके विकास पर एक मोटी रूपरेखा भी प्रस्तुत करती
है।
लेखों की मौलिकता एवं निरंतरता किसी भी रूप में प्रभावित न हो,
इस दृष्टि से इनमें संपादन की न्यूनतम कोशिश की गई है। अध्याय 2 से अध्याय
8 तक के लेख जनसत्ता (हिन्दी दैनिक) के वरिष्ठ पत्रकार राम बहादुर राय
द्वारा धर्मपालजी से की गई बातचीत पर आधारित हैं। जारी हैं गांधी पर नेहरू
के हमल शीर्षक लेख में उन्होंने गांधी और नेहरू का नाम विचारधारा के प्रतीक
के रूप में लिया है।
संपादन न्यूनतम करने के कारण पुस्तक में कहीं कहीं तथ्यों या विचारों
की पुनरावृत्ति स्वाभाविक है। इसलिये सुधी पाठकगण पुस्तक पढते समय इसे
सामान्य त्रुटि समझ कर क्षमा करेंगे, ऐसी अपेक्षा है।
आशा है यह पुस्तक विद्वान पाठकों में गुलामी की मानसिकता और
भारतीयता के बारे में एक अच्छी समझ विकसित करेगी।
28.9.2001
सेवाग्राम
शिवदत्त
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प्रस्तावना
सन् 1946-47 में अंग्रेजों की राजनैतिक सत्ता जब भारत से समाप्त
होनी निश्चित हो गई, तब सभी को लगा था कि अब भारतीय समाज स्व-विवेक
से, स्व-शक्ति से, स्व-पथ पर फिर से चल सकेगा। भारतीय जन इसे एक नये
युग का आरम्भ मान रहे थे। परन्तु ऐसा लगता है कि वह नया युग आते-आते
रूक-सा गया।
वस्तुतः उन दिनों देश में कुछ ऐसी भावना बनी कि भारत का नया युग
तो दो सौ वर्ष पूर्व अंग्रेजों के आने के साथ ही आरम्भ हो चुका था। एक
अंतरराष्ट्रीयतावादी दृष्टि के अंतर्गत यह माना जाने लगा कि औद्योगिक क्रांति
के साथ एक ही बार में सारा संसार परिवर्तित हो चुका है। अब संपूर्ण विश्व की
नियति उसी औद्योगिक विकास की दिशा में बढ़ते जाना है। इस दिशा में बढ़ने
के लिए अंग्रेजों के राज्य के दौरान सुदृढ़ हुए राज्यतंत्र तथा अन्य संस्थागत
व्यवस्थाओं का मजबूत रहना आवश्यक दिखाई दिया। अंग्रेजी राज्य के समय
की पराधीनता एवं स्वतंत्रता आंदोलन के समय की असुरक्षा की यादों के रहते
ये संस्थाएं और भी अपरिहार्य लगने लगीं। अतः इन्हें बनाये रखने में ही देश की
प्रायः समस्त सृजनात्मक शक्ति खर्च होने लगी।
अब भारतीय राज्य के 54 वर्षों तक चलने के बाद, राज्यतंत्र एवं अन्य
संस्थागत व्यवस्थाएं पर्याप्त सुदृढ़ हो चुकी हैं। देश भर में नये-नये समूह विविध
स्थानों पर भिन्न-भिन्न क्षेत्रों में कार्यप्रवृत्त हुए हैं। स्वतंत्रता संग्राम वाली पीढ़ी
की असुरक्षा की भावना के लिए अब कोई वस्तुगत कारण नहीं बचा है। वस्तुतः
वह सारी पीढ़ी अगली पीढ़ियों के लिए स्व-बुद्धि के अनुसार जीवन का आधार
जुटाकर एवं राज्य की सुदृढ़ता के पर्याप्त प्रबंध कर समाप्त हो गई है।
अब समय है कि असुरक्षा एवं असमर्थता की भावनाओं से पूर्णतः मुक्त
होकर हम देश एवं देश के भविष्य के बारे में अपनी बुद्धि से सोचें। 40-50 वर्ष
पहले भारतीय समाज का उत्तरदायित्व सम्भालने वाली पीढ़ी में गांधी जी से
भावनात्मक लगाव के बावजूद, अपनी स्मृतियों, बुद्धि-रूपों और इच्छाओं के
चलते ऐसी सामर्थ्य और ऐसे साहस का संकल्प नहीं जग सका।
देश के भविष्य के बारे में नवचिंतन करते हुए हमें यह याद रखना होगा
कि विश्व के सभी समूहों के लिए कोई एक सही निर्धारित दिशा नहीं होती है।
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