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स्वदेशी और भारतीयता (धरमपाल एवं राजीव दीक्षित - स्वावलम्बी अर्थनीति एवं ग्राम-स्वराज्य दर्शन)

स्वदेशी और भारतीयता (धरमपाल एवं राजीव दीक्षित - स्वावलम्बी अर्थनीति एवं ग्राम-स्वराज्य दर्शन)

Swadeshi Aur Bhartiyata: Swavalambi Arthniti evam Gram Swarajya Darshan

धरमपाल एवं राजीव दीक्षित विचार पीठ द्वारा

DevanagariHindipublished50 पृष्ठ

पृष्ठ 14, कुल 50 में से

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पृष्ठ 14

जारी हैं गांधी पर नेहरू के हमले

क्या अंग्रेजों ने भारत के बौद्धिक वर्ग के पश्चिमीकरण को अपने
सुरक्षा कवच की तरह इस्तेमाल किया और जब सत्ता देने की बारी भी आई
तो सत्ता उन हाथों में ही सौंपी गई जो पश्चिमपरस्त थे और जिनको
अपने देश के विकास के लिए स्वदेशी मॉडल बनाने में कोई रुचि नहीं
थी? क्या सत्ता हस्तांतरण को भी औजार के रूप में इस्तेमाल किया गया
और नेहरू इस काम में अंग्रेजों के नजदीकी मददगार बने, पर सत्ता और
सत्ता को संभाल सकने की जो बुनियादी चतुराई उनमें थी, उसने उनको
बेनकाब नहीं होने दिया ?
अंग्रेजों ने भारत के बौद्धिक वर्ग का राजनैतिक इस्तेमाल किया। 1920
में 'सेक्रेटरी आफ स्टेट्स' ने वाइसराय को लिखा कि जमींदार वर्ग पर बचाव का
भरोसा मत रखो। इस काम में बौद्धिक वर्ग को लगाओ। बौद्धिक वर्ग से यह
काम 18 वीं सदी के उत्तरार्ध से ही लिया गया होगा। इस देश की आम जनता
का जो रुख था, उसे देखते हुए अंग्रेज इस देश में अपने निजाम की सुरक्षा के
बारे में कभी आश्वस्त नहीं थे। मेटकाफ भारत में इंग्लैंड से अंग्रेजों को बड़ी
संख्या में लाने की सिफारिश करते हुए ये कहता है कि “यह ठीक है कि यहां के
लोग स्वामिभक्त हैं। पर भरोसे में मत रहिए। हवा का रुख बदला तो स्वामिभक्ति
का चोला उतर जाएगा और हमारी खैर नहीं"। 1920 के बाद तो ऐसा हुआ कि
जितने राजनैतिक वर्ग और धाराएं थीं, अंग्रेजों की कोशिश उन सबमें अंग्रेजियत
माननेवाले लोगों को दाखिल कराने और जमाने की रही। जिनको जरूरत
पड़ने पर पीटा भी जा सके, पर जिनके साथ बैठकर चाय भी पी जा सके।
आखिर मोतीलाल नेहरू गवर्नर के साथ टेनिस खेलते थे न। कुछ उसी तरह का
मामला। जरा 1942 में भी देख लीजिए। अगस्त 1942 में ब्रिटेन सरकार के एक
मंत्री को रूजवेल्ट समझाते हैं कि सत्ता हस्तांतरण का वक्त तो ब्रिटेन को ही तय
करना है। पर उसे यह भी तय करना चाहिए कि आजादी के बाद भारत पश्चिम
के असर में रहे। चीन के विदेश मंत्री ने भारत को एशियाई राष्ट्र कहा है।
रूजवेल्ट उसे चुनौती देते हैं कि नहीं, भारत के लोग यूरोपीय समुदाय के हैं।
हमारे कजिन (चचेरे भाई) हैं। यह रिश्तेदारी हमारे पढ़े-लिखे लोगों के मन में
बहुत दिनों से समाई थी। जिनकी संख्या लगातार बढ़ी थी। नीरद चौधरी

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वगैरह यही चचेरे भाई हैं न।
लेकिन स्वदेशी और भारतीयता को प्रतिष्ठित करने में महात्मा
गांधी कहां मात खा गए ? उनसे चूक कहां हुई ? इसके बारे में मुझे लगता
है कि 18 वीं शती के उत्तरार्ध में देश के अंग्रेजीदां पांच फीसदी लोगों ने जो
राजनीति शुरू की, उसके केंद्र में सत्ता में भागीदारी की मांग तो थी ही, साथ ही
अंग्रेज और अंग्रेजियत को अपने से बड़ा माना गया था। मान लिया गया था कि
हम लोग तो हजार साल से ज्यादा समय से गुलाम ही हैं। दूसरों पर निर्भर ही
रहे हैं। भागीदारी की मांग में कमतर होने की स्वीकृति भी थी। इस वर्ग को
महात्मा गांधी ने 1920 में राजनीति की मुख्यधारा से बाहर कर दिया। कुछ
अंडरग्राउंड हो गए। कुछ सार्वजनिक जीवन से हट गए। कुछ उदारतावादी हो
गए। पर ज्यादातर लोग कांग्रेस में ही बने रहे। गांधी की शक्ति और चमक से
वह डरे। कुछ ने यह भी सोचा होगा कि चलो, कुछ देर तक चलने दो यह चमक।
कुछ में भक्तिभाव भी पैदा हुआ होगा कि शायद गांधी ही सही सोच रहे हों।
1940 तक वे किनारे पर रहे। पर उसके बाद उन्होंने गांधी को अलग ठेल दिया।
इन तत्त्वों के सामने गांधी की मजबूरी का जरा अंदाज लगाइए। सुशीला नायर
की डायरी में है। 1943 में गांधी जी जेल गए तो कहते थे कि जल्दी ही छूट कर
बाहर जाऊंगा। फिर वे कहने लगे कि नहीं, अब सात साल जेल में ही रहूंगा।
1944 में तो वे बाहर आने के लिए तैयार नहीं थे। आगे का फैसला लेने में उन्हें
दो-तीन महीने लग गए। गांधी की ऐसी प्रोग्रामिंग भी थी। वे ऐसा करते थे।
और अहमदनगर जेल में नेहरू उनके लिये क्या सोच रहे थे। यही कि अब एक
और उपवास हो जायेगा। नेहरू के दिमाग में पिछले को देख-देख कर यही
बना था गांधी का मॉडल। 1943-44 में अपने अलग-थलग पड़ जाने का आभास
केवल गांधी को ही नहीं रहा, दूसरों को भी हो गया। अंग्रेजीदाँ लोग गांधी को
उनकी महानता से तो बेदखल नहीं कर सके, पर वास्तविक अर्थों में गांधी की
बेदखली हो गई।
इसी के साथ स्वदेशी की कड़ी भी शक्तिहीन हो गई। पर क्यों ?
महात्मा गांधी का अपना खड़ा किया कांग्रेस का ढांचा भी इस काम के लिए
माकूल नहीं था। 1920 में कांग्रेस के ढांचे का ड्राफ्ट गांधीजी ने खुद बनाया।
ढांचा यह है कि नीचे मेंबरशिप है। फिर जिला, फिर प्रदेश, फिर अखिल भारतीय
समिति है। फिर अध्यक्ष है। अंतिम फैसले की ताकत ऊपर है। उसी में नीचे
वालों की राय भी मान ली जाती है। देश नीचे है और उसकी लीडरशिप ऊपर।
सरकार का मॉडल ही कांग्रेस का भी मॉडल हो गया। वही कलेक्टर, कमिश्नर,
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स्व भा -4