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स्वदेशी और भारतीयता (धरमपाल एवं राजीव दीक्षित - स्वावलम्बी अर्थनीति एवं ग्राम-स्वराज्य दर्शन)

स्वदेशी और भारतीयता (धरमपाल एवं राजीव दीक्षित - स्वावलम्बी अर्थनीति एवं ग्राम-स्वराज्य दर्शन)

Swadeshi Aur Bhartiyata: Swavalambi Arthniti evam Gram Swarajya Darshan

धरमपाल एवं राजीव दीक्षित विचार पीठ द्वारा

DevanagariHindipublished50 पृष्ठ

पृष्ठ 13, कुल 50 में से

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पृष्ठ 13

दूसरे इतिहासकार भी, तो शायद समाज के एक हिस्से के मन में यह बैठा है कि
जिस समाज में अपनी हिस्सेदारी नहीं है, वह टूटे भी तो क्या ? भीतर से तो नहीं,
तो शायद कोई बाहर से ही आकर उद्धार करे। मुद्दा कोई व्यक्ति नहीं है। मुद्दा
बहुत गहरा है। कई प्रतीकों, बिंबों, मान्यताओं में समाज में एका है। पर कइयों
पर समझौता नहीं है। समाज कहीं से जुड़ा है तो कहीं से बंटा है। और जो
आदमी का रचा विधान है, वह छोटे-बड़े चक्र में घूम रहा है। एक अपरिहार्यता
की तरह। हमने इतिहास से सबक नहीं लिया है। पहले हर बात को भगवान की
लीला मान कर संतोष कर लिया जाता रहा होगा। अब सब कुछ रेखीय दृष्टि से
देखने की बात है। पर हमने उस हिसाब की संरचना नहीं बनाई है।
अंबेडकर और कांशीराम इसलिए एक ही बात करते हैं कि रिश्ते नहीं
बदलते। या रिश्ते बदले हैं, इसे नहीं दिखलाया जाता। आजाद इंडिया कम्पनी
में आर्थिक बदलाव तो हुए हैं पर सामाजिक रिश्ते जस के तस हैं। अंबेडकर
1915-16 में हिंदुस्तान आते हैं। बड़ौदा में नौकरी मिलती है। पर रहने को घर
नहीं मिलता। पहले दिन से ही कठिनाइयां शुरू हो जाती हैं। बहुत बार वे अपने
समाज की कठिनाइयों को प्रतीक के तौर पर अपनी निजी कठिनाइयां बनाकर
बताते हैं। अपने बचपन की दिक्कतें तो शायद उन्हें याद भी नहीं। पर वे अपने
समाज के लिये खड़े होते हैं। 1940 तक तो बखूबी। और शायद 1946 तक भी।
अपने समाज के साथ जुड़े होने की बात वे छिपाते नहीं। उन्होंने कहा कि बाकी
भारत का वे क्या करेंगे ? काहे को सोचें उसकी ? उन्हें तो अपने लोगों को
बचाना है। तो अपने लोगों को बचाने में उन्हें अगर मोहम्मद तुगलक की बजाय
जापान की मदद लेनी हो तो लेंगे। क्यों नहीं लेंगे ?
कांशीराम जैसों के भारत के मान्य प्रतीकों को गिराने से क्या
देश टूट की ओर नहीं बढ़ेगा ? मुझे लगता है कि यह व्यवस्था टूट रही है,
संरचना टूट रही है, इसलिए कुछ लोगों को देश टूटने का वहम हो सकता है।
व्यवस्था की टूट को वे देश की टूट मान लेते हैं। इस तरह के हर चक्र की सीमा
भी होती है। गांधी अंबेडकर के दायरे और उनकी मजबूरियों को भी जानते थे।
इतिहास की धारा से दोनों ही अनजान नहीं थे। पर उनकी बुनियादी चिंताएं
अलग थीं। 1946 में गांधी पटेल को अंबेडकर के बारे में लिखते हैं कि अंबेडकर
सत्य-असत्य का फर्क नहीं मानते। पर यह भी कहते हैं कि उनसे बात जारी
रखना। बातचीत तोड़ना नहीं। अंबेडकर के पत्ता (राजनैतिक) बनने के प्रति भी
वे सतर्क हैं। और उसकी काट करते रहते हैं। राजनीतिक और समाजिक दोनों
धरातल पर। अंबेडकर के 1942 तक के जो बयान हैं या उन्होंने सेक्रेटरी आफ
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स्टेट को जो 40-50 पेज का ज्ञापन भेजा, उस पर सेक्रेटरी आफ स्टेट ने
वाइसराय को लिखा कि अब तक हमारे पास मुस्लिम पत्ता था। अब यह एक
और पत्ता है। हालांकि हाशिए में अंडर सेक्रेटरी ने गोद दिया कि यह पत्ता बहुत
कमजोर है। गांधी ने इसे पहले ही काट दिया है। यह जरूर है कि हाशिए में
लिखी बात वाइसराय तक नहीं पहुंचाई गई। सीमाएं थीं। दो महीने बाद ही
सेक्रेटरी आफ स्टेट फिर नोट भेजते हैं कि अंबेडकर खुद तो काबिल आदमी हैं।
पर उनके साथ के लोग बस यूं ही हैं। ये लोग मुसलमान या ईसाई बन गए होते
हो इनकी कुछ मदद की जा सकती थी।
तो क्या जो काम तब नहीं हो सका, वह काम आज दूसरों की
नजर में नहीं होगा ? ऐसी सामाजिक कमजोरियों पर बाहरी ताकतों की
नजर तो होती ही है। पर नजर होना भर एक बात है। असली बात समाज की
अंदरूनी मनःस्थिति की है। जिस तरह कांशीराम अपने समाज के उद्धार के
लिए महमूद गजनवी को याद कर सकते हैं, उस तरह का काम समाज के दूसरे
हिस्से भी कर सकते हैं। सामाजिक संरचना ने एक खास किस्म की मानसिकता
बना दी है। यह मानसिकता खाली अंबेडकर की नहीं है। ब्राह्मणों और दूसरे
लोगों ने भी ऐसा किया है। मद्रास और बंगाल में तो जरूर ही। 18 वीं शती
आते-आते उन्हें जब लगा कि हम हार गए तो फिर अंग्रेजों के साथ कोलेबोरेशन
(सहयोग) तय किया गया।
यह सहयोग बहुत भिन्न नहीं था। कांशीराम जैसों के कहने का तरीका
भोंड़ा है। उनका सलीकेदार रहा। कांशीराम सार्वजनिक जीवन में ज्यादा नहीं
रहे न, इसलिए भोंडेपन से बोल देते हैं। कुछ वर्षों में वे भी बोलने और करने की
चालाकी सीख जाएंगे।
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