स्वदेशी और भारतीयता (धरमपाल एवं राजीव दीक्षित - स्वावलम्बी अर्थनीति एवं ग्राम-स्वराज्य दर्शन)
Swadeshi Aur Bhartiyata: Swavalambi Arthniti evam Gram Swarajya Darshan
धरमपाल एवं राजीव दीक्षित विचार पीठ द्वारा
पृष्ठ 12, कुल 50 में से
संदर्भ में पढ़ेंगाँधी को गाली देना नया नहीं है
स्वदेशी की परिकल्पना क्यों एक खोए हुए सपने सी लगने लगी
है ? क्यों इस देश के लोग महात्मा की 'मूर्ति' तोड़ने की मानसिकता से
बच नहीं पाते ? किसी के मुंह से महमूद गजनवी की जयकार कैसे
निकलने लगती है ? और क्या ये सब उत्पात के लक्षण हैं ? और हैं तो उन
उत्पातों से बचने और देश को बचाने का कोई रास्ता भी है क्या ?
आम लोगों की तरह गांधीवादियों को भी ये सवाल मथ रहे हैं। पर
उनमें कोई खुदबुदी या सनसनी नहीं है। बहुत सारी बातें चक्रीयगति में चलती
हैं। शुरू होती हैं। उभरती हैं। गिर जाती हैं। और फिर नए सिरे से उठ जाती
हैं। न उनकी आम स्वीकृति बनती है, और न खारिज ही हो पाती है। गांधी और
गांधीवाद को 1920 के बाद से लगातार ऐसे हमलों का शिकार होना पड़ा है।
पश्चिमपरक जवाहरलाल नेहरू और अंतरराष्ट्रीय ताकतों ने मिलकर 1944
आते-आते ही महात्मा को किनारे कर दिया था। 1920 से संजोई स्वदेशी की
कड़ी तो उसी घड़ी टूट गई। पर उतने से ही संतोष नहीं हुआ। उसके बाद तो
गांधी पर बदले की कार्यवाही के तौर पर हमला किया गया। गांधी के बचाव में
उनके जन भी नहीं आ सकते थे क्योंकि गांधी खुद स्वदेशी का वैकल्पिक मॉडल
नहीं दे सके थे। ढांचा बनाने का वक्त ही नहीं मिला था उन्हें। जो बना भी था
वह ताश के महल जैसा था। और कांग्रेस ? अंग्रेजीदाँ भारतीयों की सत्ता में
भागीदारी की इच्छा और अंग्रेजों के विरुद्ध आम जनता के गुस्से को सोखता देने
की मिली-जुली रणनीति से जन्मी इस संस्था का ढाँचा कभी इस बात का रहा
ही नहीं कि यह पश्चिमीकरण का विरोध कर सकती। स्वदेशी और स्वालंबन-
गांधी की 20 साला कमान को छोड़ दें तो कभी इसके काँग्रेस के गुणधर्म नहीं
रहे। उसका ढांचा ही पश्चिमी मॉडल पर बना है। और उसकी बुनियाद में ही
पश्चिम का श्रेष्ठ होना लिखा है।
कांशीराम का महमूद गजनवी को दलितों का उद्धारक कहना कुछ
नया नहीं है। 1951 में लुधियाना में चुनावी सभा में डा. आंबेडकर ने अंग्रेजों पर
धोखेबाजी का आरोप लगाया। कहा कि, अंग्रेज हिंदुस्तान में बिना सेना के आए
थे। हमारे लोगों ने उनकी सेना बनवाई। उनका राज कायम किया। पर हम वैसे
20
के वैसे ही रहे। कांशीराम जैसे लोग चक्रीय गति के तहत वही आंबेडकर की ही
बात दोहरा रहे हैं। देश में 1947-48 से जो चला आ रहा है, वही चलता चला
जा देते हैं। आर. के. पाटिल कहते थे कि शिकायत क्या? अंग्रेजों से जो चढ़ती
कंपनी (ग्रोइंग कन्सर्न) हाथ में लिया था, उसे चला रहे हैं। कुछ भूलें हुई होंगी,
पर कुछ खास तो नहीं। 1933 में वर्णाश्रम स्वराज्य संघ के लोग ब्रिटेन गए। वहां
एम.ए. जयकर कहते हैं कि आजादी इसलिए जरूरी है कि जब तक हम अपना
राज्य कायम नहीं करते तब तक तरक्की नहीं कर सकते। अपने समाज की
कुरीतियाँ दूर नहीं कर सकते। जयकर के पहले भी बहुत से लोगों ने यही बात
कही होगी। तो यह मॉडल तो पश्चिमीकरण का ही है। आजाद भारत के
कर्णधारों ने यही मॉडल तो चुना। जयकर ने संस्मरण लिखा है 1926 तक का।
वे महाराष्ट्र के एक गांव में जाते हैं और लिखते हैं कि यह गांव उतना ही सुंदर
है जैसे कि स्कॉटलैंड का कोई गांव हो। तो उपमा के लिए उन्हें स्कॉटलैंड ही
मिलता है। यह मानसिकता ही कुछ ऐसी बन गई है। इस मानसिकता में जिस
भावना को हम भारतीयता कहते हैं, वह कुछ जमती नहीं। ठीक-ठीक परिभाषित
नहीं है यह, पर भावना तो है और खत्म नहीं होती। जबकि यूरोप में इस किस्म
की भावना खत्म हुई। वहां मार-काट बहुत हुई। नए-नए आक्रमणकारी आते
रहे, बसते रहे, पिटते रहे। समूह नहीं बने। ऑटोमेशन हुआ। प्लेटो ने तो यहाँ
तक कहा कि बच्चे को अपने पिता का पता नहीं लगना चाहिए। नहीं तो परिवार
समूह ही बन जाएगा। अरस्तू कहते हैं कि गुलाम काम करने के लिए रखे जाते
हैं। काम करने वाली कोई मशीन हो तो फिर गुलामों की जरूरत नहीं रहेगी। तो
मशीन का विचार उनके दिमाग में तभी आ गया। तो पश्चिमी समाज का तरीका,
उनकी विचार पद्धति कुछ और है। वह एक अलग मॉडल है। हमारा अंग्रेजीदाँ
वर्ग उसी पर लट्टू रहा है।
कांशीराम जैसे लोगों को लेकर देश के एक हिस्से में जो चिंताएं
जाहिर की जा रही हैं, उनका क्या ? चंद्रशेखर इशारा करते हैं कि वे
भारत को तोड़नेवाली ताकतों से मिलीभगत में हैं। अशोक सिंघल ईसाई
मिशनरियों की मिलीभगत की बात करते रहे हैं। यह इतना बड़ा संशय
क्यों ?
हो सकता है कि कोई वैसी साजिश हो। पर इन बातों की शुरुआत
विदेशी साजिश से नहीं होती। शुरुआत तो अपने समाज की जो शक्तियां हैं,
जो ऐतिहासिक कारण हैं, उनके संघर्ष से होती है। बाद में उसका चाहे जो
इस्तेमाल करे। अगर आंबेडकर की बात ही कांशीराम भी कहते हैं और कई
21