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स्वदेशी और भारतीयता (धरमपाल एवं राजीव दीक्षित - स्वावलम्बी अर्थनीति एवं ग्राम-स्वराज्य दर्शन)

स्वदेशी और भारतीयता (धरमपाल एवं राजीव दीक्षित - स्वावलम्बी अर्थनीति एवं ग्राम-स्वराज्य दर्शन)

Swadeshi Aur Bhartiyata: Swavalambi Arthniti evam Gram Swarajya Darshan

धरमपाल एवं राजीव दीक्षित विचार पीठ द्वारा

DevanagariHindipublished50 पृष्ठ

पृष्ठ 11, कुल 50 में से

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प्रमाद और संवेदन शून्यता की अभी की स्थिति तो हमें आत्मक्षय और आत्मविलोप
की ओर ही ले जाएगी।
दुविधाग्रस्त मनोदशा में रहकर तो हम कहीं भी नहीं पहुंच पायेंगे।
गहराई से आत्म-स्मरण और मनन करना होगा और स्पष्ट निर्णय लेना होगा।
अगर स्वयं को यूरोपीय सांचे में ही ढालने का हमारा मन बन चुका है, तो उसी
दिशा में सुनियोजित प्रयास करें। हो सकता है, हम उसमें सफल होकर सशक्त
और उन्नत समाज तथा राष्ट्र बना सकें।
लेकिन यह अधिक सम्भव है कि इस दिशा में बढ़ने पर पश्चिम और
शेष विश्व पर हमारी निर्भरता आज जैसी ही बनी रहे या बढ़ती जाये तथा हम
पश्चिमी जीवन शैली के एक तीसरे दर्जे के अनुयायी ही बने रहें। अपने देश के
80 से 90 प्रतिशत लोगों के प्रति हम अभी की तरह उदासीन बने रहें और उन
सब लोगों को घुटघुटकर जीने के लिये विवश करने वाली अपनी वर्तमान
जीवनशैली जारी रखें। इससे उनकी घुटन और बढ़ती चली जायेगी तथा हम
अपनी लालसाओं में एवं अपने अपेक्षाकृत छोटे पड़ोसियों के साथ अन्तहीन
झगड़ों में और भी अधिक उलझते चले जायेंगे।
परन्तु मुझे तो आशा यही है कि भारत के करोड़ों युवा जन ऐसी
हीनता, अधीनता तथा उस पर निर्भरता को उचित नहीं मानते और यह जीवन
शैली उन्हें प्रिय नहीं है। और इसलिए मेरा विश्वास है कि, वे भारत की पुनर्रचना
के बारे में विचार, मंथन तथा मनन प्रारम्भ करेंगे जिससे कि भारतीय जीवन की
समृद्धि, विशेषता और समस्त जीवन जगत के प्रति आत्मीयता तथा सामंजस्यपूर्ण
सम्बन्धों वाली जीवन-शैली फिर से साकार हो सके और नये-नये रूपों में
अभिव्यक्त हो सके।
छः
भारत की प्राचीनता और विविधता भारत के लिये एक बड़ा वरदान ही
रही। काल के बहाव में यह अवश्य हुआ होगा कि इस विविधता से भारत में कुछ
उलझनें भी पैदा हुई होंगी। कुछ विविधताएँ तो काल के प्रभाव से मृतप्राय ही रह
गयी होंगी, अवशेषों जैसी।
भारतीय साहित्य मात्रा में तो विराट है ही, इसकी रचना की
कालावधि भी सुदीर्घ है। विश्व के और साहित्यों की तरह इसमें भी नयी-नयी
कृतियाँ, विचार, व्यवस्थाएँ जुड़ती रहीं और समय-समय पर पहले कही गयी
बातें नये-नये ढंगों से कही जाती रहीं। इस प्रकार के बदलाव सभी क्षेत्रों में
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मिलेंगे चाहे वह ज्योतिषशास्त्र हो, या आयुर्वेद या राज्य और अर्थनीति या रामायण
ही। महर्षि बाल्मीकि रामायण के बाद अनेकों रामायण रचे गये और उन सबमें
अलग-अलग तरह से पुराना कुछ-कुछ बदलता गया और नया कुछ-कुछ
जुड़ता गया। भारत की सनातनता एक तरह से भारतीय प्रवाह में रही, उसके
ग्रन्थों व स्थिरता में नहीं।
इस्लाम के शासकों ने, जहाँ-जहाँ उनका कुछ प्रभुत्व रहा, वहाँ भारतीय
सनातनता को बांधकर देखने की कोशिश की, जैसा कि विदेशियों को अपरिचित
स्थानों, विचारों व सामग्रियों के साथ, अपनी समझ के लिये करना पड़ता है।
उन्होंने भारतीयता को जहां-तहां बांधना चाहा, उसमें स्थिरता और शिथिलता
लानी चाही। लेकिन उनसे यह अधिक नहीं हो सका।
यूरोप और विशेषतः अंग्रेज, इस दिशा में और कार्य में, अधिक तीव्रता
से आगे बढ़े। अंग्रेज पूरे भारत को राजनीतिक और आर्थिक तौर पर अपने
अधीनस्थ भी कर पाये। अपने राज्य को पक्का करने के लिये उन्होंने भारतीय
ग्रन्थों में से वह सब छांट-छांटकर इकट्ठा किया, जो उनके काम का था और
उसे ही ऊपर उछाला। उसी में से एक तरह का भारतीय इतिहास रचा गया
और भारत की व्याख्याएं बनाई गईं। ऐसे इतिहासों और व्याख्याओं में सब
असत्य या काल्पनिक ही हो, ऐसी बात नहीं है। लेकिन यह सब जो चित्रण
किया गया, यह सन्दर्भ रहित हो गया। इसमें भारतीय चित्त, आत्मा और
मानसिकता एकदम किनारे रख दी गई। यह चित्रण जो अंग्रेजों द्वारा किया
गया, इससे 1860-1870 के बाद भारत में एक बड़ी टूटन हुई। धीरे-धीरे
सन्दर्भ अदृश्य जैसे हो गया और टूटा एवं बिखरा भारत हमारे पास रह गया।
स्वराज आने का लक्ष्य यह था कि हम भारत के अपने सन्दर्भ को फिर
से पायें तथा बिखरे और रौंदे हुए भारतीयता के लाखों टुकड़ों को भारत के
सन्दर्भ से, फिर से जोड़ें। यह काम हम अभी तक नहीं कर पाये हैं। शायद अभी
तक हमें यह सूझा भी नहीं है कि इस तरह का सन्दर्भ खोजना और बिखरे
टुकड़ों को इससे जोड़ना भी हमारा काम है।
पुराने अवशेषों के अलावा, अब हमारे यहाँ बहुत ही अधिक, पिछले
200-400 बरस में बनी, व्यवस्थाओं, कानूनों, तन्त्रों, बीमार मानसिकताओं का
ढेर का ढेर कबाड़ इकट्ठा हो गया है। हमें जीवित रहना है तो इन सब को
हटाकर कहीं जलाना व दफनाना ही पड़ेगा। तब ही ठीक तरह से सन्दर्भ
मिलेगा और जैसा भी जुड़ाव हम आज चाहते हैं, वह बन सकेगा।
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