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सर्वकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

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पृष्ठ 599

कापा नवि. 6

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चिकित्सास्थानम्‌ वाभ्यां स्नेहं विनिर्मथ्य ततोऽनुकल्कम्‌ । विमथ्य संयोज्य पुन-,

अ० ३८ |

्रवैस्तद्वस्तौ नि दध्यात्मथितं खजेन ॥ “ख्वण का परिमाण

मात्रा मं रखना चाहिये, अन्यथा दाह ओर अतिखार करता है ॥२३-३६॥

अत ऊध्वं द्वादशप्रस्तान्‌ वद्यामः-- दत्वाऽऽदो सेन्धवस्याक्षं मधुनः प्रखतिद्धयम्‌ | विनिमथ्य ततो दद्यात्‌ स्तेहस्य प्रसृतित्रयम्‌ ॥३५॥ एकोभूते ततः स्नेहे कल्फस्य प्रसतिं क्षिपेत्‌ । संमूच्छिते कषायं तु चतुःप्रसदिसंमितम्‌ ॥(२९॥ वितरेच्च तद्ावापमन्ते द्विप्रसतोन्मितम्‌ एवं प्रकल्पितो वस्तिद्धोदशप्रसतो भवेत्‌ ॥२९॥ ज्येष्ठायाः खलु मात्रायाः प्रमाणमिदमीरितम्‌। अपहासे भिषक्ङुयात्तहत्‌ प्रसृतिहापनम्‌ ॥४०॥ यथावयो निरूहाणां कस्पनेयमुदाह्ृता ।

सेन्धवादिद्रवान्तानां सिद्धिकामेमिषग्बरेः ॥४९॥

इसके आगे बारह प्रसृतवाले निरूहो को कहेगे- प्रथम सेन्धव एक कष, मधु दो प्रसृत (चार पल), इनको मिल]कर इसमे स्नेह तीन भ्रसृत मिलाय । जब स्नेह मिख्कर एक हो

जाये तव इसमे कल्क एक प्रसृत मिलाये । मिलकर एक हो जाने

पर कषाय चार प्रसृत मिखये । पीछे से इसमे प्रर्तेप दो प्रसृत

मिलाये । इस प्रकार बनाने से बस्ति वदरा प्ररत की बनती

हे । यह मात्रा शरेष्ठ बस्ति की उत्तम मात्रा दै। घटाने मे वेय

इसमे एक एक प्रसृति वय के अनुखार षटाये। सिद्धिकौ

सफर्ता चाहनेवाला वैद्य सैन्धव से ठेकर कषाय पयन्त द्रव्यो

मे इसी अनुपात मे कमी करे । चरक मे-निरूहमात्रा प्रसृताधमाये वपं ततोऽधप्रसृता-

भद्विः । आद्रादशास्स्यात्‌ प्रसृतामिद्द्िरशदशाद्‌ द्वादशतः

पर्‌ स्यु" । आससतेरु्तमिदं प्रमाणमतःपरं षोडशवद्‌ विधेयम्‌ ॥ निरुदमान्ना परसृतप्रमाणा बाले च बधे च मदुविंशेषः ॥२७.४२१॥

अत ऊध्वे' प्रव्यन्ते बस्तयोऽत्र बिभागञ्जः। यथादोषं प्रयुक्ता ये हन्युनोनाविधान्‌ गदान्‌ ॥४२॥

इसके आगे प्रथग्‌ सूप म बस्तर्यों को कहते ह। ये

बस्तियां रोग एवं दोघ के अनुसार दी जाने पर नाना प्रकार

के रोगो को नष्ट करती ह ॥४२॥

रस्पाकोरुबुवषौभूवाजिगन्धानिशाच्छदः ।

पञ्चमूखीवरारास्नागृड चाुरदारुभिः ||४३॥

कथितेः पाक्किरेभिमेदनाष्टकसंय॒तेः। _ .

कल्केमागधिकाम्भोदहपुषामिसिसेन्धवेः ९ .॥ वत्साह्यप्रियंगूप्रायश्टयाह्यरसाञ्ञनेः। दयादार्थापनं कोष्णं क्षौद्रायेरभिखस्छृतम्‌ ॥४५॥

। ५८४१

परोरुत्रिकशूलाश्मविण्मूत्रानिरसङ्किनाम्‌ । ग्रहणीमारुतार्शोषनं रक्तमांसवटप्रदम्‌ ॥४६॥।

अमलतास, एरण्ड, पुननवा, अजवायन्‌, शटी, वृहयं च￾मृक, बरा, रास्ना, गिखोय, देव दाङ इन द्रव्यो को सोद पठ

लेकर ( चार मेनफठ से एक पल वनता दै )- एक सौ अद्धा्स पर पानी में क्वाथ करके, छानकर बत्तीस पर व चाये | इसे से आठ पल लेकर पिप्पली, मुस्ता, दाऊबेर, सफ, सेन्धव,

इन्द्रजो, प्रियंगु, मुेहटी, वच, रसौत इनका कल्क मिखये | मधु, क्वण आदि से संस्छृत करके सुहाता हआ गरम आस्था-

पन देवे । पीठ, ऊरू, भिकशुल, अश्मरी-मल-मूत्र-वायु के अवरोध, ग्रहणी, वायु-अशं को नष्ट करता दै, रक्त-मांख तथा

चर देताहे। (क्वाथमेसे आठ पलल, शेष क्वाथको

दुसरी या तीसरी बार के श्ये रख लेवे-डल्दण ) ॥४२-४६॥

गुड़ चीत्रिफारास्तादशमूख्वरापलेः । कथितः श्छदर्णापष्टस्तु प्रियज्खघन पैन्धवेः ॥४७॥

जतपुष्पावचाकरष्णायवानीकुषएबिल्वजेः |

सगुडरक्षमात्रस्तु मदनाधेपडान्वितेः ॥४०॥ छ्षोद्रतेखधृतक्षोरशयुक्तकाञ्ञिकमस्तुभिः।

समालोड्य च मूत्रेण दयादास्थापनं परम्‌ ॥४<॥

तेजोबणेबरोत्साह वोयोग्निप्राणवधंनम्‌ ।

सवेमारुतरोगष्नं वथःस्थापनमुत्तमम्‌ ॥५०॥

गिलोय, त्रिफला, रासना, दशमूर, बला ये सोकह्‌ द्रव्य,

ओर मांख (इन द्रव्यं के बरार) द्रञ्य एक एक पठ ओर मांस

सोलह पल लेकर एक सो कत्तीस य पानी मे क्वाथ करे। चतुर्थांश रहने पर छानकर इसमे एक पुटक के किए आठ

पल टेकर, प्रियंगु, सुस्ता, सेन्ध्र, सोर, बच, पिप्पली, अज￾वायन, कूट, विल्व, इनका बारीक कल्क, ओर गुड़ एक एक्‌ अक्ष मिलाकर इसमे मेनफल आधा पल, मधु, घी, दूष, शुक्त,

कांजी, मस्तु आर मूर इन सबको घोठकृर आस्थापन देवे ।

यह निरूह तेज, वणे, बर, उत्साह, वीयं, अग्नि ओर प्राण को

दाने मे श्रेष्ठ है । सव वात रोगोंको नष्ट करता है। वय को

स्थिर रखने मे उत्तम हे ॥ ७-५०॥ कुशादिपद्चमूखाञ्दत्रिफरोतपर्वासकेः ।

सारिवोीरमजिजष्ठारास्नारेणुपरूषकेः॥५९॥ पाटिकिः कथितेः सस्यग्‌ द्रग्येरमिश्च पेषितेः।

टकास्मगुपरभकेसरारुरुचन्दनैः ॥५२॥ सिः |

परपद्यकयश्टयाहेः क्षो द्रक्षीरघृताप्ठुतेः ॥५२॥

द्त्तमास्थापं शीतमम्छदीनेस्तथा द्रवः ।

दाहास ग्द्रपित्तासुकपित्तगुरमञ्वराञ्जयेत्‌ ॥५४॥

ङः काश, नङ; द्गः इछ, मुस्ता, जनिफला, नीलकमल अ ¢ अद्धा; साख, खस? मजीठ, रास्ना, रेणु (पष्क), काक

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इ [५ १५ =, कनै ९. । 9. = न = ना, ।