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सर्वकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

पृष्ठ 598, कुल 872 में से

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पृष्ठ 598

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मुमुक्षुसंहिता

[ अ० ३८ ]

न तु मुक्तवतो देयमास्थापनमिति स्थितिः ॥१९॥
विमुचिका वा जनयेच्छर्दि वाऽपि सुदारुणम् ।
कोपयेत् सर्वदोषान् वा तस्मादद्यादभोजिते ॥२०॥
भोजन करने पर आस्थापन नहीं देना चाहिये, यह सिद्धान्त है। ऐसा न करने से या तो विमुचिका होती है, या भयानक बमन होता है। अथवा सब दोषों को निरुद्ध कुपित कर देता है, इसलिये भोजन न किये हुए को निरुद्ध देवे ॥
जीर्णोन्मत्त्याशये दोषाः पुंसः प्रव्यक्तिमागतः ।
निःशेषाः सुखमायान्ति भोजनेनाप्रपीडिताः ॥२१॥
न वाऽऽस्थापनविक्षिप्तमन्तमग्निः प्रधावति ।
तस्मादास्थापनं देयं निराहाराय जानता ॥२२॥
आवस्थिकं क्रमं चापि बुद्ध्वा कार्यं निरुहणम् ।
मल्लेऽपकृष्टे दोषाणां बलवत्त्वं न विद्यते ॥२३॥
अन्न के जीर्ण होने पर आशय (पकाशय) में वातादिदोष स्पष्ट हुए होने से—भोजन के कारण से न दवे होने पर सम्पूर्ण रूप में शान्त हो सकते हैं। अथवा आस्थापन से विक्षिप्त बनी अग्नि अन्न की ओर नहीं दौड़ती। इसलिये जाननेवाला बिना भोजन किये हुए में आस्थापन देवे ॥
आवस्थिक (अवस्थानुसार) विधि को समझकर भी निरुद्ध देना चाहिये। क्योंकि मल के निकल जाने पर दोषों का बल कम हो जाता है ॥२१-२३॥
क्षीराण्यम्लानि मूत्राणि स्नेहाः क्वाथा रसास्तथा ।
लवणानि फलं क्षौद्रं शताह्वा सषं पंच वा ॥२४॥
एता त्रिकटुकं रास्ता सरलो देवदारु च ।
रजनी मधुकं हिङ्कु कुष्ठं संशोघनानि च ॥२५॥
कटुका शर्करा मुस्तमुगौरं चन्दनं शटी ।
मज्जिष्ठा मदनं चण्डा त्रायमाणा रसाळजनम् ॥२६॥
बिल्बमध्वं यवानो च फलिनी शकजा यवाः ।
काकोली क्षीरकाकोली जीवकषभकावुभौ ॥२७॥
तथा मेदा महामेदा ऋद्धिर्दुष्टिर्मधूलिका ।
निरुहेषु यथालाभमेष वर्गो विधीयते ॥२८॥
दूध, अम्ल, मूत्र, स्नेह, क्वाथ, मांसरस, लवण, त्रिफला, मधु, रौप, सरसों, बच, इलायची, सोंठ, मरिच, पिप्ली, रास्ता, चौड, देवदार, हल्दी, मुलैहठी, हींग, कूट और त्रिवृत्त आदि संशोघन, कुटकी, शर्करा, मुस्ता, खर, चन्दन, कचूर, मजीठ, मैनफल, चण्डा (गठोना), त्रायमाण, रसौत, बिल्ब का गूदा, अजवायन, प्रियंगु, इन्द्रजो, काकोली, क्षीरकाकोली, जीवक, ऋषभक, मेदा, महामेदा, ऋद्धि, दुष्टि, मधूलिका इनमें से जो मिल सके उनका निरुद्धों में उपयोग करे ॥
स्वस्थे क्वाथस्थ चत्वारो भागाः स्नेहस्थ पञ्चमः ।
कृद्धेऽनिले चतुर्थस्तु षष्ठः पित्ते कफेऽष्टमः ॥२९॥

सर्वेषु चाष्टमो भागः कल्कानां लवणं पुनः ।
क्षौद्रं मूत्रं फलं क्षीरमम्लं मांसरसं तथा ॥३०॥
युक्त्या प्रकल्पयेद्द्वीमान् निरुहै कल्पना त्रिवयम् ॥३१॥
स्वस्थ अवस्था में क्वाथ के चार भाग और पाँचवाँ भाग स्नेह, वायु क्रोप में स्नेह चौथा भाग, पित्त में छठा भाग और कफ में स्नेह का आठवाँ भाग होना चाहिये। सब निरुद्धों में कल्क का आठवाँ भाग होना चाहिये। लवण, मधु, मूत्र, मैनफल, दूध, कांजी, मांसरस इनको बुद्धिमान् युक्ति से मिलाये।
वक्तव्य—मधुस्नेहेनकल्कात्यकषाया वापतः क्रमात्। त्रीणि षड्द्रादशत्रिणि पलान्यनिलरोगिणाम् ॥ पित्ते चत्वारि चत्वारि द्वे द्विपंच चतुष्टयम्। षट्त्रिणि द्वे दशत्रिणि कफे चापि निरुहणम् ॥ चरक में—भागाः कषायस्य तु पंचपित्ते स्नेहस्य षष्ठः प्रकृतौ स्थिते च। वाते विरुद्धे तु चतुर्थभागो मात्रा निरुहेषु कफेऽष्टभागः ॥ चरक ॥२६-३१॥
कल्कस्नेहेकषायाणामत्रिवेकाद्विष्वरैः।
वस्तेः सुकल्पना मोक्ता तस्य दानं यथार्थकृत् ॥३२॥
कल्पनाविधि—कल्क, स्नेह, और कषाय ये सब मिलकर एक हो जायें, यह कल्पना वैद्यों ने बताई है। वस्ति की सुकल्पना बनाकर उसका देना यथार्थ फलदायक है।
वक्तव्य—न धावत्यौषधं पाणि न तिष्ठत्यावलप्य च। न करोति च सीमन्तं स निरुहः सुयोजितः ॥३२॥
द्रव्याऽऽदौ सैन्धवस्याक्षं मधुनः प्रसूतद्रव्यम्।
पात्रे तलेन मथनीयात्तद्भ्रन् स्नेहं शनैः शनैः ॥३३॥
सम्यक् सुमथिते दद्यात् फलकल्कमतः परम्।
ततो यथोचितान् कल्कान् भागैः स्वेः रलक्षणपेक्षितान्।
गम्भीरे भाजनेऽन्यस्मिन्मथनीयात्तं खजेन च।
यथा वा साधु मन्येत न सान्द्रो न तनुः समः ॥३४॥
रसक्षीराम्लमूत्राणां दोषावस्थामवेक्ष्य तु।
कषायप्रसूतान् पञ्च सुपूतास्तत्र दापयेत् ॥३६॥
प्रथम सैन्धव एक कर्ष मात्रा में डाले, मधु दो प्रसूत मिलाकर पात्र में इनको हाथ से खूब मथे। मथने पर तैल धीरे धीरे मिलता जाये। भली प्रकार मथे जाने पर मैनफल का कल्क इसमें मिलाये फिर पीछे से कहे हुए दूसरे कल्कों को बारीक पीसकर मिलाये। इस सब को अब एक बड़े गहरे पात्र में डालकर मन्थन दण्ड से मथे। अथवा जैसे ठीक समझे, वैसे मथे। यह न तो बहुत घट्ट होना चाहिये और न पतला, अपितु समान रहना चाहिये। दोषों की अवस्था देखकर मांसरस, दूध कांजी, मूत्र मिलाये। इसमें भली प्रकार छाना हुआ कषाय पाँच प्रसूत मिलाये।
वक्तव्य—अन्यत्र “माक्षिकं लवणं स्नेहं कल्कं क्वाथमिति क्रमात्” यह क्रम कहा है। चरक में—पूर्व हि योज्यं मधुस्नेहं